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________________ २१३ गाथा ९४] दसणमोहोवसामणा ३६. द्विदिबंधो वि एदासिं चेव पयडीणमंतोकोडाकोडीमेत्तो चेव होदि, विसुद्धयरस्सेदस्स तत्तो अब्भहियद्विदिबंधासंभवादो। अणुभागबंधो वि एदेसु महादंडएसु जाओ अप्पसत्थाओ पयडीओ तासिं वेढाणिओ, सेसाणं पसत्थाणं चउट्ठाणिओ। ३७. पदेसबंधो वि पंचणाणावरणीय-छदंसणावरणीय-सादावेदणीय-बारसकसाय-पुरिसवेद-हस्स-रदि-भय-दुगुंछ -तिरिक्खगइ-मणुसगइ -पंचिंदियजादि-ओरालियतेजा-कम्मइयसरीर-ओरालियसरीरअंगोवंग-वण्ण-गंध-रस-फास-तिरिक्ख-मणुसगइपाओग्गाणुपुत्वी-अगुरुअलहुआदि४--उज्जोव-तस-बादर-पजत्त-पत्तेयसरीर-थिर-सुभ-जसगित्तिणिमिण-उच्चागोद-पंचंतराइयाणमेदासि पयडीणमणुकस्सओ। णिहाणिद्दा-पयलापयलाथीणगिद्धी-मिच्छत्त-अणंताणुबंधि०४-देवगइ - वेउब्वियसरीर - समचउरससंठाण - वेउव्वियसरीरअंगोवंग-वारिसह०संघडण-देवगइपाओग्गाणुपुव्वी-पसत्थविहायगइ-सुभगसुस्सरादेज्ज-णीचागोदाणमेदासिं पयडीणमुक्कस्सगो अणुक्कस्सगो वा पदेसबंधो। एवं विदियगाहासुत्तस्स विदियावयवमस्सियूण बंधमग्गणं कादूण संपहि पयडीणमुदयावलियपवेसापवेसगवेसणहूँ सुत्तपबंधमुत्तरं भणइ * कदि आवलियं पविसंति त्ति विहासा। ३८. दंसणमोहउवसामगस्स उदयावलियमुदयाणुदयसरूवेण पविसमाणीओ ३६. स्थितिबन्ध भी इन्हीं अर्थात् तीनों महादण्डकोंमें कही गई प्रकृतियोंका अन्तःकोड़ाकोड़ीप्रमाण ही होता है, क्योंकि यह विशुद्धतर परिणामोंसे युक्त होता है, इसलिए इसके उससे अधिक स्थितिबन्ध सम्भव नहीं है । अनुभागबन्ध भी इन तीनों महादण्डकोंमें जो अप्रशस्त प्रकृतियाँ हैं उनका द्विस्थानीय होता है तथा शेष प्रशस्त प्रकृतियोंका चतुःस्थानीय होता है। $ ३७. प्रदेशबन्ध भी पाँच ज्ञानावरणीय, छह दर्शनावरणीय, सातावेदनीय, बारह कषाय, पुरुषवेद, हास्य, रति, भय, जुगुप्सा, तिर्यश्चगति, मनुष्यगति, पञ्च न्द्रियजाति औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, औदारिकशरीरआंगोपांग, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, तियेश्वगत्यानुपूर्वी, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघु आदि चा दि चार, उद्योत, त्रस, बाद प्रत्येकशरीर, स्थिर, शुभ, यश कीर्ति, निर्माण, उच्चगोत्र और पाँच अन्तराय इन प्रकृतियोंका अनुत्कृष्ट होता है। निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, देवगति, वैक्रियिकशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वैक्रियिकशरीरआंगोपांग, वर्षभनाराचसंहनन, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, प्रशस्त विहायोगति, सुभग, सुस्वर, आदेय और नीचगोत्र इन प्रकृतियोंका उत्कृष्ट या अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध होता है। इस प्रकार दूसरे गाथासूत्रके दूसरे अवयवका आश्रय कर बन्धका अनुमार्गण कर अब प्रकृतियोंके उदयावलिमें प्रवेश और अप्रेवशका अनुसन्धान करनेके लिये आगेके सूत्रप्रबन्धको कहते हैं * 'कितनी प्रकृतियाँ आवलिमें प्रवेश करती हैं' इस पदकी विभाषा । $ ३८. दर्शनमोहके उपशामक जीवके उदय और अनुदयरूपसे उदयावलिमें प्रवेश
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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