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________________ गाथा ९४] . दसणमोहोवसामणा २०३ कसायपरिणामो होदि त्ति भणिदं होइ, तेसिमेक्कस्स वि पयदविसए विरोहाणुवलंभादो। तत्थ किमेसो वड्डमाणकसायपरिणामो आहो हायमाणकसायपरिणामो त्ति एदिस्से आसंकाए णिरारेगीकरणद्वमुत्तरसुत्तं भणइ * किं सो वड्ढमाणो हायमाणो त्ति ? णियमा हायमाणकसायो । २०. किं कारणं ? विसुद्धीए वड्डमाणस्सेदस्स वड्डमाणकसायत्तेण सह विरोहादो । तदो कोहादिकसायाणं विट्ठाणाणुभागोदयजणिदं तप्पाओग्गं मंदयरकसायपरिणाम मणुभवंतो एसो सम्मत्तमुप्पाएदुमाढवेइ त्ति सिद्धो सुत्तस्स समुदायत्थो । * उवजोगे त्ति विहासा। २१. कः पुनरुपयोगो नाम ? उपर्युक्तेऽनेनेत्युपयोगः, आत्मनोऽर्थग्रहणपरिणाम इत्यर्थः । स पुनद्वैधा व्यवतिष्ठते साकारतरभेदात् । तत्र साकारो ज्ञानोपयोगः । अनाकारो दर्शनोपयोगः । तद्भदाश्च मतिज्ञानादयश्चक्षुर्दर्शनादयश्च । तत्रायं कतरेणोपयोगेन परिणतः सन् प्रथमसम्यक्त्वमुत्पादयतीत्यत्रोत्तरमाहकषायपरिणाम होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है, क्योंकि उनमेंसे एकका भी प्रकृत विषयमें विरोध नहीं पाया जाता। उनमेंसे यह क्या वर्धमान कषाय परिणामवाला होता है या हीयमान कषाय परिणामवाला होता है। इस प्रकार इस आशंकाका निराकरण करनेके लिये आगेका सूत्र कहते हैं * क्या वह वर्धमान कषायवाला होता है या हीयमान कषायवाला होता है ? नियमसे हीयमान कषायवाला होता है । २०. क्योंकि विशुद्धिसे वृद्धिको प्राप्त होनेवाले इसके वर्धमान कषायके साथ रहनेका विरोध है, इसलिए क्रोधादि कषायोंके द्विस्थानीय अनुभागके उदयसे उत्पन्न हुए तात्प्रायोग्य मन्दतर कषाय परिणामका अनुभवन करता हुआ सम्यक्त्वको उत्पन्न करनेके लिये आरम्भ करता है इस प्रकार इस सूत्रका समुदायरूप अर्थ सिद्ध हुआ। विशेषार्थ—पहले क्षयोपशम आदि चार लब्धियोंके स्वरूप निर्देशके प्रसंगसे प्रायोग्य लब्धिका स्वरूप निर्देश कर आये हैं । उसीसे यह स्पष्ट हो जाता है कि जो जीव सम्यक्त्व ग्रहणके स सन्मख होता है उसके अन्य कर्मोंके समान मोहनीय कर्मका अनुभाग विशद्धिवश द्विस्थानीय हो जाता है। उसमें भी प्रति समय उसमें अनन्तगुणी हानि होती जाती है, इसलिये इस जीवके हीयमान कषायपरिणामका ही उदय रहता है यह सिद्ध होता है। * 'उपयोग' इस पदकी विभाषा। $ २१. शंका उपयोग किसका नाम है ? समाधान—जिसके द्वारा उपयुक्त होता है उसका नाम उपयोग है । आत्माके अर्थके प्रहणरूप परिणामका नाम उपयोग है यह उक्त कथनका अर्थ है। वह उपयोग साकार और अनाकारके भेदसे दो प्रकारका है। उनमेंसे साकार झानोयोग है और अनाकार दर्शनोपयोग है। तथा उनके क्रमसे भेद मतिज्ञानादि और चक्षुदर्शनादिक हैं। उनमेंसे यह दर्शन मोहका उपशामक जीव किस उपयोगसे परिणत होता हुआ प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न करता है ऐसा प्रश्न होनेपर यहाँ उसका उत्तर देते हुए कहते हैं
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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