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________________ गाथा ९४ ] दसणमोहोवसामणा २०१ १५. एवं ताव गाहापुव्वद्धमस्सियूण परिणामस्स विसुद्धभावं पदुप्पाइय संपहि गाहापच्छद्धावलंबणेण जोगादिविसेसपरूवणटुं सुत्तपबंधमुत्तरं भणइ * जोगे त्ति विहासा। १६. जोगे त्ति' पदस्स एण्हि अत्थविहासा कीरदि त्ति भणिदं होइ । * अण्णदरमणजोगो वा अण्णदरवचिजोगो वा ओरालियकायजोगो वा वेउव्वियकायजोगो वा। और संसारके कारणोंके प्रति जिसके चित्तमें उदासीनता आई है वही जीव सम्यग्दर्शनका प्राप्त करनेका अधिकारी है। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए यहाँ सर्व प्रथम यह बतलाया गया है कि जो अति दुस्तर मिथ्यात्वरूपी गर्त में से निकलना चाहता है। किन्तु इतना विचार करने मात्रसे कि संसार और संसारके कारण हितकर नहीं, इस जीवको संसारसे छुटकारा नहीं मिल सकता । इसके लिये उसके चित्तमें निरन्तर मोक्ष और मोक्षके कारणोंके प्रति उत्तरोत्तर भीतरसे आदरभाव होना चाहिए। यह तभी सम्भव है, जब कि यह जीव मिथ्यात्वसेवनके कारणरूप बाह्य साधन कुदेव, कुगुरु और कुशास्त्रोंकी सेवा-अध्ययन आदि छोड़कर परमार्थस्वरूप देव, गुरु और परमागमकी सेवा-स्वाध्याय आदिमें सावधान बने । जब भीतरसे यह जीव हर्षातिरेकसे आपूरित होकर परमार्थस्वरूप देव और गुरुकी उपासना तथा परमागमके श्रवण-मननमें निरन्तर सावधान रहता है तब उसके उत्तरोत्तर परिणामोंमें विशुद्धि होकर भीतर क्रिया-परिणाम द्वारा जो बाह्य लाभ होता है उस लाभको ही परमागममें चार लब्धियोंकी प्राप्ति कहा है। वे चार लब्धियाँ ये हैं-क्षयोपशमलब्धि, विशुद्धिलब्धि, देशनालब्धि और प्रायोग्यलब्धि । उनका स्वरूप इस प्रकार है-परिणामोंकी विशुद्धिवश पूर्वमें संचित हुए कर्मोंके अनुभागस्पर्धकोंके प्रति समय अनन्तगुणे हीन होकर उदीरित होनेका नाम क्षयोपशमलब्धि है। प्रतिसमय अनन्तगुणे हीन होकर उदीरणाको प्राप्त हुए अनुभाग स्पर्धकोंके निमित्तसे ऐसे परिणामोंका होना जो साता आदि प्रशस्त प्रकृतियोंके बन्धके निमित्त हैं और असाता आदि अशुभ कर्मोके बन्धके विरुद्ध हैं, विशुद्धिलब्धि है । छह द्रब्य और नौ पदार्थोके उपदेशका नाम देशना है । उस देशनासे परिणत आचार्य आदिको उपलब्धि तथा उपदिष्ट अर्थके ग्रहण, धारण और विचार करनेरूप शक्तिकी प्राप्तिका नाम देशनालब्धि है। तथा सब कोकी.उत्कष्ट स्थिति और उत्कृष्ट अनुभागका घात कर उन्हें क्रमसे अन्तःकोडाकोडी सागरोपमप्रमाण स्थितिके भीतर और द्विस्थानीय अनुभागमें स्थापित करना प्रायोग्यलब्धि है। जो जीव उक्त चार लब्धियोंके सद्भावमें अन्तस्तत्त्वके मननपूर्वक उत्तरोत्तर परिणामोंकी विशुद्धिद्वारा सम्यक्त्व ग्रहणके सन्मुख हो वह अधःकरण परिणामोंको प्राप्त होता है, उसके इन चार लब्धियोंका सद्भाव नियमसे होता है यह समग्र कथनका तात्पर्य है। ६ १५. इस प्रकार सर्व प्रथम गाथाके पूर्वार्धका आश्रय कर परिणामकी विशुद्धिका कथन कर अब गाथाके उत्तरार्धके अवलम्बन द्वारा योग आदि विशेषोंका कथन करनेके लिये आगेके सूत्रप्रबन्धको कहते हैं * 'योग' इस पदकी विभाषा । $ १६. इस समय 'योग' इस पदका विशेष व्याख्यान करते हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है। * अन्यतर मनोयोग, अन्यतर वचनयोग, औदारिक काययोग या वैक्रियिक काययोगहोता है।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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