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________________ गाथा ९४] दसणमोहोवसामणा १९९ परिसेसेइ, अणुभागस्स वा केत्तिये भागे ओवट्टेदूण केवडियं भागमुवसेसेदि त्ति सुत्तत्थसंबंधावलंबणादो । एवमेदेसिं गाहासुत्ताणमुत्थाणत्थपरूवणं कादूण संपहि एदेसि वित्थारत्थपरूवणट्ठमुत्तरं चुण्णिसुत्तपबंधमणुसरामो । * एदाओ चत्तारि सुत्तगाहाओ अधापवत्तकरणस्स पढमसमए परूविदवाओ। ६९. एवं भणंतस्सायमहिप्पाओ-एदाओ सुत्तगाहाओ अधापवत्तकरणपढमसमयादो हेहिमोवरिमावत्थासु पडिबद्धत्थपरूवणाए णिबद्धाओ। तम्हा दोण्हमवट्ठाणं साहारणभावेण मज्झावत्थाए मज्झदीवयसरूवेणेदासिं परूवणं कायव्वमिदि जाणावणट्ठमेदाओ गाहाओ अधापवत्तकरणपढमसमए परूवेयव्वाओ त्ति भणिदं होइ। संपहि 'जहा उद्देसो तहा णिदेसो' त्ति णायमवलंबिय पढमं ताव पढमगाहामुत्तत्थं विहासिदुकामो इदमाह * तंजहा। १०. सुगमं । * 'दंसणमोहउवसामगस्स परिणामो केरिसो भवे' त्ति विहासा। ११. एदस्स ताव पढमगाहापुव्वद्धस्स अत्थविहासा एण्हिमहिकीरदि त्ति वुत्तं होइ। भागको शेष बचाता है तथा अनुभागके कितने भागोंका अपवर्तन कर कितने भागको शेष बचाता है इस प्रकार सूत्रका अर्थके साथ सम्बन्धका अवलम्बन लिया गया है। इस प्रकार इन गाथासूत्रोंके उत्थानिकारूप अर्थका कथन कर अब इनके विस्तारपूर्वक अर्थका कथन करनेके लिए आगेके चूर्णिसूत्रके प्रबन्धका अनुसरण करते हैं___ * ये चार सूत्रगाथाएँ अधःप्रवृत्तकरणके प्रथम समयमें कहनी चाहिए। ६९. ऐसा कहनेका यह अभिप्राय है-ये सूत्रगाथाएँ अधःप्रवृत्तकरणके प्रथम समयसे पूर्वकी और बादकी अवस्थाओंमें प्रतिबद्ध अर्थको प्ररूपणा करनेमें निबद्ध हैं, इसलिये दोनों अवस्थाओंके लिये साधारण ऐसी मध्यकी अवस्थामें मध्यदीपकरूपसे इनका कथन करना चाहिए इस बातका ज्ञान करानेके लिये ये गाथाएं अधःप्रवृत्तकरणके प्रथम समयमें कथन योग्य हैं यह कहा है । अब 'उद्देश्यके अनुसार निर्देश किया जाता है' इस न्यायका अवलम्बन लेकर सर्वप्रथम प्रथम गाथासूत्रके अर्थका विशेष व्याख्यान करनेकी इच्छासे इसे कहते हैं * वह जैसे। $ १०. यह सूत्र सुगम है। * 'दर्शनमोहके उपशामकका परिणाम कैसा होता है ?' इसकी विभाषा । $ ११. सर्वप्रथम प्रथम गाथाके इस पूर्वाधके अर्थका विशेष व्याख्यान इस समय अधिकृत करते हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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