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________________ १९६ जयधवलास हिदे कसायपाहुडे [सम्मत्ताणियोगद्दारं १० ५. एसा गाहा सणमोहउवसामगस्स तदुम्मुहावत्थाए पयट्टमाणस्स परिणामविसेसपरूवणटुं तस्सेव जोग-कसायोवजोग-लेस्सा-वेदभेदाणं च परूवणट्ठमोइण्णा । तत्थ ताव पुव्वद्धण' 'दसणमोहउवसामगस्स परिणामो केरिसो भवे', किं विसुद्धो विसुद्धयरो संकिलिट्ठो संकिलिट्ठयरो वा ति विसोहि-संकिलेसावेक्खो पुच्छाणिद्देसो कओ दट्ठव्यो । पच्छद्धेण वि 'जोगे कसाय उवजोगे लेस्सा वेदो य को भवे' किमविसेसेण सव्वेसिमेव जोगकसायोवजोगादिमेदाणमेदस्स संभवो, आहो अत्थि को विसेसो त्ति तव्विसयविसेसणिण्णयावेक्खो पुच्छाणिद्देसो कओ होइ । एवं पुच्छिदत्थविसयविसेसणिण्णयमुवरि चुण्णिसुत्तसंबंधेण कस्सामो, सुत्तसिद्धस्स अत्थस्स पुध परूवणाए फलविसेसाणुवलंभादो। एवं ताव पढमगाहाए संखेवेणुत्थाणत्थपरूवणं काढूँण संपहि विदियगाहाए अवयारं कस्सामो(३८) काणि वा पुव्वबद्धाणि के वा अंसे णिबंधदि। कदि आवलियं पविसंति कदिण्हं वा पवेसगो॥२॥ ६६. एसा विदिया गाहादसणमोहउवसामगस्स णाणावरणादिकम्माणं संतकम्मबंधोदयावलियपवेसोदीरणाणं पयडि-द्विदि-अणुभाग-पदेसविसयाणं पुच्छामुहेण परुवटुं ओइण्णं । तं जहा—'काणि वा पुव्यबद्धाणि' त्ति एसो सुत्तस्स पढमावयवो, सव्वेसिं ५. दर्शनमोहके उपशमके सन्मुख हुई अवस्थामें प्रवृत्त हुए दर्शनमोहके उपशामक जीवके परिणामविशेषका कथन करनेके लिये तथा उसीके योग, कषाय, उपयोग, लेश्या और वेदके भेदोंका कथन करनेके लिये यह गाथा आई है। उनमेंसे सर्व प्रथम पूर्वार्धके 'दर्शनमोहके उपशामकका परिणाम कैसा होता है। इस वचन द्वारा क्या विशुद्ध होता है, या विशुद्धतर होता है, संक्लिष्ट होता है या संक्लिष्टतर होता है ? इस प्रकार विशुद्धि और संक्लेशको अपेक्षा पृच्छाका निर्देश किया हुआ जानना चाहिए । तथा उत्तरार्धके 'किस योग, कषाय और उपयोगमें विद्यमान उसके लेश्या और वेद कौनसा होता है इस वचनद्वारा क्या सामान्यसे सभी योग, कषाय, और उपयोगादिके भेद इसके सम्भव हैं या कोई विशेषता है इस प्रकार उक्त पृच्छाविषयक विशेष निर्णयकी अपेक्षा रखनेवाला यह पृच्छाका निर्देश किया है। इस प्रकार पूछे गये अर्थका विशेष निर्णय आगे चूर्णिसूत्रके सम्बन्धसे करेंगे, क्योंकि सूत्रसिद्ध अर्थकी पृथक् प्ररूपणामें फलविशेष नहीं पाया जाता। इस प्रकार सर्व प्रथम प्रथम गाथा द्वारा संक्षेपसे उत्थानिकारूप अर्थका कथन करके अब दूसरी गाथाका अवतार करते हैं * दर्शनमोहका उपशम करनेवाले जीवके पर्वबद्ध कर्म कौन-कौन हैं, वर्तमानमें किन कर्माशोंको बाँधता है, कितने कर्म उदयावलिमें प्रवेश करते हैं और यह किन कर्मोका प्रवेशक होता है ॥९२॥ ६. यह दूसरी गाथा दर्शनमोहका उपशम करनेवाले जीवके ज्ञानावरणादि कर्मसम्बन्धी प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशविषयक सत्कर्म, बन्ध, उदयावलिप्रवेश और उदीरणाका पृच्छामुखसे कयन करनेके लिये आई है। यथा-'काणि वा पुत्वबद्धाणि' यह १. ताप्रती पुव्वद्धण वि इति पाठः । २. ता०प्रती-विसे सियाणं इति पाठः।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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