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________________ १९४ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ सम्मत्ताणियोगद्दारं १० * कसायपाहुडे सम्मत्ते त्ति अणिओगद्दारे अधापवत्तकरणे इमाओ चत्तारि सुत्तगाहाओ परूवेयव्वाओ। ११. एदस्स सम्मत्तसण्णिदमहाहियारस्स उवक्कमादिभेयभिण्णचउविहावयारपरूवणट्ठमेदं सुत्तमागयं । तं जहा, चउन्विहो एत्थावयारो-उवक्कमो णिक्खेवो भयो अणुगमो चेदि । तत्थ उवक्कमो पंचविहो—आणुपुब्बी णामं पमाणं वत्तव्वदो अत्थाहियारो चेदि । तत्थाणुपुब्वी तिविहा पुव्वाणुपुव्वीआदिभेदेण । एत्थ पुव्वाणुपुवीए दसमो एसो अत्थाहियारो । पच्छाणुपुव्वीए छट्ठो। जत्थ-तत्थाणुपुवीए अणिद्धारिदसंखाविसेसो एसो अस्थाहियारो त्ति वत्तव्वं । णामं पमाणं च सुगम । वत्तव्वदा ससमयो तदुभयं वा, सम्मत्तपरूवणाए तप्पडिवक्खपरूवणाविणाभावित्तादो। अत्थाहियारो दुविहो—दसणमोहस्सुवसामणा खवणा चेदि, दोण्हमेदेसिं सम्मत्ताहियारजोणित्तादो। णिक्खेव-णयोवक्कमपरूवणा जाणिय कायव्वा ।। २. इदाणिमणुगमं वत्तइस्सामो । को अणुगमो णाम ? पयदाहियारस्स वित्थारपरूवणटुं तदवलंबणीभूदगाहासुत्ताणुसरणमणुगमो त्ति इह विवक्खिओ। यदाह'अधापवत्तकरणे इमाओ चत्तारि सुत्तगाहाओ परूवेयव्वाओ' ति । एतदुक्तं भवतिसम्मत्ते त्ति अणियोगद्दारस्स अत्थविहासणे कीरमाणे दंसणमोहस्सुवसामणा पुव्वमेव * कषायप्राइतके सम्यक्त्व नामक अनुयोगद्वारके अन्तर्गत अधःप्रवृत्तकरणसम्बन्धी इन चार सूत्रगाथाओंका कथन करना चाहिए। १. इस सम्यक्त्वसंज्ञक महाधिकारके उपक्रम आदि भेदरूप चार प्रकारके अवतारका कथन करनेके लिये यह सूत्र आया है । यथा-प्रकृतमें अवतार चार प्रकारका है-उपक्रम, निक्षेप, नय और अनुगम। उनमेंसे उपक्रम पाँच प्रकारका है-आनुपूर्वी, नाम, प्रमाण, वक्तव्यता और अर्थाधिकार । उनमेंसे पूर्वानुपूर्वी आदिके भेदसे आनुपूर्वी तीन प्रकारकी है। प्रकृत में पूर्वानुपूर्वीकी अपेक्षा यह दसवाँ अर्थाधिकार है, पश्चादानुपूर्वीकी अपेक्षा यह छटा अर्थाधिकार है और यत्र-तत्रानुपूर्वीकी अपेक्षा अनिर्धारित संख्यावाला यह अर्थाधिकार है ऐसा यहाँ कथन करना चाहिए। नाम और प्रमाण ये दोनों सुगम हैं। वक्तव्यता स्वसमयवक्तव्यता और तदुभयवक्तव्यता जानना चाहिए, क्योंकि सम्यक्त्वकी प्ररूपणा उसकी प्रतिपक्ष प्ररूपणाके अविनाभावस्वरूप है। अर्थाधिकार दो प्रकारका है-दर्शनमोहोपशामना और दर्शनमोहक्षपणा, क्योंकि ये दोनों अर्थाधिकार सम्यक्त्व अधिकारके योनिस्वरूप हैं। निक्षेप, नय और उपक्रमका विशेष कथन जानकर करना चाहिए। ६२. अब अनुगमको बतलाते हैं। शंका-अनुगम किसे कहते हैं ? समाधान—प्रकृत अधिकारका विस्तारपूर्वक कथन करनेके लिये उसके अवलम्बनस्वरूप गाथासूत्रोंके अनुसरण करनेको अनुगम कहते हैं ऐसा अर्थ प्रकृतमें विवक्षित है। जैसा कि कहा है-'अधःप्रवृत्तकरणके विषयमें इन चार सूत्र गाथाओंका कथन करना चाहिए।' इसका यह तात्पर्य है-सम्यक्त्व इस अधिकारके अर्थका विशेष व्याख्यान करने पर दर्शन
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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