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सिरि-जइवसहाइरियविरइय-चुण्णिसुत्समण्णिदं सिरि-भगवंतगुरणहरभडारोवइलैं
कसा य पाहु डं
तस्स
सिरि-वीरसेरणाइरियविरइया टीका
जयधवला
तत्य सम्मत्तमणिओगद्दारं
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णमो अरहंताणं पणमह जिणवरवसहं गणहरवसहं तहेव गुणहरवसहं । दुसहपरीसहविसहं जइवसहं धम्मसुत्तपाढरवसहं ॥१॥ इय पणमिय जिणणाहे गणणाहे तह य व मुणिणाहे ।
सम्मत्तसुद्धिहेउं वोच्छं सम्मत्तमहियारं ॥२॥ जिनवरवृषभ, गणधरवृषभ, गुणधरवृषभ और दुःसह परीषहोंको जीतनेवाले तथा धर्मसूत्रके पाठकोंमें श्रेष्ठ ऐसे यतिवृषभको तुम सब प्रणाम करो ॥१॥
इस प्रकार जिननाथ, गणनाथ और मुनिनाथको प्रणाम कर सम्यक्त्वशुद्धिके निमित्तरूप सम्यक्त्व अधिकारका मैं कथन करता हूँ ॥२॥
१. ताप्रती पाठरवसहं इति पाठः ।