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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ वंजणं ९, $ १. चउन्हं कसायाणमेयट्ठपरूवणमोइण्णस्स' वंजणे ति अणिओगद्दारस्स विहासण गाहासुत्तसमुक्कित्तणं कस्सामो त्ति भणिदं होइ । णवरि एदम्मि अणि - योगद्दारे पंचसुत्तगाहाओ पडिबद्धाओ 'वियंजणे पंच गाहाओ' त्ति भणिदत्तादो । तासिं जाइदुवारेणेयवयणणिसो एत्थ कओ त्ति दट्ठव्वो । एवं गाहासुत्त समुक्कित्तणं पइण्णाय तण्णिसं कुणमाणो पुच्छावक्कमिदमाह - १८६ * तं जहा । $ २. सुगममेदं पुच्छावकं । एवं पुच्छाविसईकयाणं गाहासुत्ताणं पयदत्थाहियारपडिबद्धाणं जहाकममेसो सरूवणिद्देसो (३३) कोहो य कोव रोसो य अक्खम संजलण कलह वड्ढी य । झंझा दोस विवादो दस कोहेयट्टिया होंति ॥ १ ८६ ॥ $ ३. एसा पढमसुत्तगाहा कोहकसायस्स एगट्टपरूवणट्ठमागया । तं जहाक्रोधः कोपो रोषः अक्षमा संज्वलनः कलहो वृद्धिः झंझा द्वेषो विवाद इत्येते दश क्रोधपर्यायशब्दाः एकार्थाः प्रतिपत्तव्याः । तत्र क्रोध - कोप- रोषाः धात्वर्थसिद्धत्वात् १. चारों कषायोंके पर्यायवाची नामोंका कथन करनेके लिये उपस्थित हुए व्यञ्जन इस अनुयोगद्वारका विशेष व्याख्यान करनेके लिये गाथासूत्रोंका समुत्कीर्तन करेंगे यह उक्त कथनका तात्पर्य है । इतनी विशेषता है कि इस अनुयोगद्वार में पाँच सूत्रगाथाऐं प्रतिबद्ध हैं, क्योंकि पहले 'वियंजणे पंच गाहाओ' इस प्रकारका वचन कह आये हैं । उनका जातिद्वारा यहाँ एकवचन निर्देश किया है ऐसा जानना चाहिए। इस प्रकार गाथासूत्रोंके उल्लेखकी प्रतिज्ञा करके उनका निर्देश करते हुए इस पृच्छासूत्रको कहते हैं * वह जैसे । $ २. यह पृच्छावाक्य सुगम है। इस प्रकार पृच्छाके विषय किये गये तथा प्रकृत अर्थाधिकार में प्रतिबद्ध गाथासूत्रों का यथाक्रम यह स्वरूपनिर्देश है * क्रोध, कोप, रोष, अक्षमा, संज्वलन, कलह, वृद्धि, अंज्ञा, द्वेष और विवाद arah ये दश एकार्थक नाम हैं ॥१-८६ ॥ $ ३. यह प्रथम सूत्रगाथा क्रोधकषायके एकार्थक नामोंके कथन करनेके लिये आई है । यथा- कोध, कोप, रोष, अक्षमा, संज्वलन, कलह, वृद्धि, संज्ञा, द्वेष और विवाद ये दश क्रोध के पर्यायवाची शब्द एकार्थक जानने चाहिए। उनमें से क्रोध, कोप और रोष शब्द धात्वर्थनिष्पन्न होनेसे सुबोध हैं । अर्थात् उक्त तीनों शब्द क्रमसे क्रुधू, कुप और रुष धातुओंसे बने हैं, अतः जिस-जिस अर्थ में ये धातुऐं प्रसिद्ध हैं वही इन शब्दोंका अर्थ है ऐसा यहाँ समझना चाहिए । क्षमारूप परिणामका न होना अक्षमा है । इसीका दूसरा नाम १. ता० प्रती - मेयद्वाणपरूवणट्टमोइण्णस्स इति पाठः । २. ता० प्रती क्रोध (व) इति पाठः ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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