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________________ थागा ८७] माणकस्सयस्स पज्जायणामाणि १८७ सुबोधाः। न क्षमा अक्षमा अमर्ष इत्यर्थः। सम्यक् ज्वलतीति संज्वलनः स्व-परोपतापित्वमेतेन क्रोधाग्ने प्रतिपादितम् । कलहः प्रतीत एव । वर्धन्ते अस्मात् पापायश:कलह-वैरादय' इति वृद्धिः क्रोधकषायः, सर्वेषामनर्थानां तन्मूलत्वात् । झंझा नाम तीव्रतरसंक्लेशपरिणामः, तद्धेतुत्वात् क्रोधकषायोऽपि तथा व्यपदिश्यते । द्वेषः अप्रीतिरन्तःकालुष्यमित्यर्थः । विरुद्धो वादः विवादः स्पर्द्धः संघर्ष इत्यनर्थान्तरम् । एवमेते दश पर्यायशब्दाः क्रोधकषायस्य भवन्तीति गाथार्थः । क्रोधः कोपो रोषः संज्वलनमथाक्षमा तथा कलहः । झंझा-द्वेष-विवादो वृद्धिरिति क्रोधपर्यायाः ॥ १ ॥ (३४) माण मद दप्प थंभो उक्कास पगास तध समुक्कस्सो। अत्तुक्करिसो परिभव उस्सिद दसलक्खणो माणो ॥२-८७॥ ६४. एषा द्वितीयगाथा क्रोधानन्तरनिर्देशाईस्य मानकषायस्यैकार्थनिरूपणार्थमागता । तद्यथा-मानो मदो दर्पः स्तम्भः उत्कर्षः प्रकर्षः समुत्कर्षः आत्मोत्कर्षः परिभव उत्सिक्त इत्येवं दशलक्षणो मानः प्रत्येतव्यः, दशास्य पर्यायशब्दा इत्युक्तं भवति । तत्र जात्यादिभिरात्मानं आधिक्येन मननं मानः। तैरेवाविष्टस्य सुरापीतस्येव अमर्ष है यह इसका तात्पर्य है । जो भले प्रकार जलता है, इसलिये क्रोधका एक नाम संज्वलन है, क्योंकि यह स्व और परको संतप्त करनेवाला है। इससे क्रोध एक प्रकारकी अग्नि है यह कहा गया है । कलहका अर्थ प्रतीत ही है। इससे पाप, अयश, कलह और वैर आदि वृद्धिको प्राप्त होते हैं, इसलिए क्रोधकषायका एक नाम वृद्धि है, क्योंकि सभी अनर्थोकी जड़ क्रोध है । तीव्रतर संक्लेश परिणामका नाम झंझा है, उसका हेतु होनेसे क्रोधकषाय भी उस नामसे व्यपदिष्ट की जाती है। द्वषका अर्थ अप्रीति है, आन्तरिक कलुषता यह इसका तात्पय है। विरुद्ध वादका नाम विवाद है। स्पर्धा और संघर्ष ये इसके नामान्तर हैं। इस प्रकार ये दश क्रोधकषायके पर्यायवाची शब्द हैं यह इस गाथाका अर्थ है। क्रोध, कोप, रोष, संज्वलन, अक्षमा, कलह, झंझा, द्वेष, विवाद और वृद्धि ये क्रोधके पर्यायवाची शब्द हैं ॥१॥ * मान, मद, दर्प, स्तम्भ, उत्कर्ष, प्रकर्ष, समुत्कर्ष, आत्मोत्कर्ष, परिभव और उत्सित इन दश लक्षणवाला मान है ॥२-८७॥ ४. यह दूसरी गाथा क्रोधके बाद निर्देशके योग्य मानकषायके एकार्थवाची शब्दोंके कथन करनेके लिये आई है । यथा-मान, मद, दर्प, स्तम्भ, उत्कर्ष, प्रकर्ष, समुत्कर्ष आत्मोत्कर्ष, परिभव और उसिक्त इस प्रकार दश लक्षणवाला मान जानना चाहिए। मानके ये दश पर्यायवाची शब्द हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है। उनमेंसे जाति आदिके द्वारा अपनेको १. ता०प्रतो पापाशयः कलहवेरादय इति पाठः।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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