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________________ गाथा ८५] सुत्तविभासा १८१ ____ * जो अंतोमुहुत्तादीदमंतो अद्धमासस्स कोधं वेदयदि सो वालुवराइसमाणं कोहं वेदयदि।। ५२. जो वुण अंतोमुहुत्तकालमुल्लंघिय अंतो अद्धमासस्स कोहं वेदयदि सो णियमा वालुवराइसमाणं कोहमणुहवदि त्ति घेत्तव्वं । कुदो १ वालुअराईए व्व तस्स कोहपरिमाणस्स अंतोमुहुत्तमुल्लंघिय अद्धमासस्स अंतो अवट्ठाणदंसणादो । एदं च कसायोदयजणिदकलुसपरिणामस्स सल्लभावेण परिणदस्स तेतियमेत्तकालावट्ठाणं पेक्खियण भणिदं, अण्णहा कोहोवजोगावट्ठाणकालस्स उक्कस्सेण वि अंतोमुहुत्तमेत्तपमाणपरूवयसुत्तेण सह विरोहप्पसंगादो। एसो च कोहपरिणामभेदो वेदिजमाणो जीवस्स संजमघादं करिय संजमा जमे जीवं ठवेइ त्ति. णिच्छओ कायव्यो । * जो अद्धमासादीदमंतो छण्हं मासाणं कोधं वेययदि सो पुढविराइसमाणं कोहं वेदयदि । ५३. जो. खलु जीवो अद्धमासं बोलिय छण्हं मासाणमंतो कोहं वेदयदि सो पुढविराइसमाणं तदियं कोधं वेदयदि, तजणिदसंसकारस्स पुढविभेदस्सेव अंतो छण्हं विशेषार्थ— यहाँ यह बतलाया है कि जो उदकराजिके समान मन्द अनुभागस्वरूप क्रोधका वेदन करता है उसका अनुभव में आनेवाला वह क्रोध परिणाम संयमका घात करने में तो समर्थ नहीं है, किन्तु संयमकी अत्यन्त शुद्धिका प्रतिबन्ध कर मलको उत्पन्न करता है। इससे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि बुद्धिपूर्वक मात्र संज्वलनकषायका सद्भाव जहाँ तक ' सम्भव है जीवके वहीं तक प्रमाद दशा होती है। सातवें आदि चार गुणस्थानोंमें संज्वलन कषाय है पर अबुद्धिपूर्वक है, इसलिये इनमें अप्रमाद दशा कही गई है। अन्यत्र (श्रीधवलामें) जो पाँच महाव्रत आदिरूप परिणामोंको भी अप्रमाद कहा है उसका भी आशय यही है। * जो अन्तर्मुहूर्तके बाद अर्धमासके भीतर तक क्रोधका वेदन करता है वह वालुकाराजिके समान क्रोधका वेदन करता है । ५२. परन्तु जो जीव अन्तर्मुहूर्त कालको उल्लंघन कर अर्धमासके भीतर तक क्रोधका वेदन करता है वह नियमसे वालुकाराजिके समान क्रोधका अनुभव करता है ऐसा यहाँ पर ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वालुकाराजिके समान उस क्रोधपरिणामका अन्तर्मुहूर्तको उल्लंघन कर अर्धमासके भीतर तक अवस्थान देखा जाता है। और यह, कषायके उदयसे उत्पन्न हुए शल्यरूपसे परिणत कलुषपरिणामके उतने काल तक अवस्थानको देखकर, कहा है। अन्यथा क्रोधोपयोगके अवस्थान कालके अन्तर्मुहूर्तप्रमाण कथन करनेवाले सूत्रके साथ विरोधका प्रसंग आता है । यह क्रोध परिणामका भेद अनुभवमें आता हुआ संयमका घात करके जीवको संममासंयममें स्थापित करता है ऐसा निश्चय करना चाहिए। * जो अर्धमासके बाद छहमाहके भीतर तक क्रोधका वेदन करता है वह पृथिवीराजिके समान क्रोधका वेदन करता है । ५३. जोजीव नियमसे अर्धमासको बिताकर छह माहके भीतर तक क्रोधका वेदन करता है वह पृथिवीराजिके समान तृतीय क्रोधका वेदन करता है क्योंकि उससे उत्पन्न हुआ संस्कार
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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