SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 231
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १८० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ चउट्ठाणं ८ ५०. सेसाणं माणादीणं तिण्हं कसायाणं जाणि हाणाणि लदासमाणादिमेदेण बारससंखावच्छिण्णाणि तेसिं भावदो भावमासेज णिदरिसणोवणओ कदो । तं जहामाणस्स भावो थद्धत्तं, तस्स सेलघणादिणिदरिसणभेदेण पयरिसापयरिसजुत्तस्स तहा चेय द्वाणसण्णा अणुमग्गिया। मायाए भावो वक्कंतमणुज्जुगदा, तस्स वि वंसिजण्हुआदिणिदरिसणोवणयमुहेण तब्भावस्स तारतम्मसंभवो णिदरिसिदो । लोमभावो असंतोसजणिदा संकिलिट्ठदा, तस्स वि किमिरागरत्तादिणिदरिसणोवण्णासमुहेण जहाभावमेव समत्थणा कया त्ति । संपहि कोहट्ठाणाणं चउण्हं पि कालेण णिदरिसणोवणओं कओ ति जं पुन्वसुत्ते पइण्णादं तस्स वित्थारत्थपरूवणट्ठमुवरिमं पबंधमाह * जो अंतोमुहुत्तिगं णिधाय कोहं वेदयदि सो उदयराइसमाणं कोहं वेदयदि। ५१. जो जीवो अंतोमुहुत्तियं भाव णिधाय धरेयूण कोधं वेदयदि सो उदयराइसमाणं चेव कोहं वेदयदि । किं कारणं ? उदयराईए व्व तस्स चिरतरकालावट्ठाणेण विणा तकालमेव विलयदंसणादो। एसो च कोहकसायवेदो वेदिजमाणो जीवस्स ण किंचि संजमघादं कुणइ, मंदाणुभागत्तादो । किन्तु संजमस्स अच्चंतसुद्धिं पडिबंधइ, तत्थ पमादादिमलुप्पायणे वावदत्तादो । ५०. शेष मानादि तीन कषायोंके लतासमान आदि भेदसे बारह संख्यारूप जो स्थान हैं उनका 'भावदो' भावका आश्रय लेकर उदाहरण पूर्वक अर्थसाधन किया गया है। यथा-मानका भाव स्तब्धता है। शैलघन आदि जितने उदाहरणभेद हैं उनके समान प्रकर्ष और अप्रकर्षयुक्त उस मानकी उसी प्रकार स्थानसंज्ञा योजित की गई है। मायाका भाव अनर्जुगत वक्रता है, इसलिये वांसकी जड आदि उदाहरणोंके ग्रहणद्वारा मायाके भी उस भावका तारतम्य बन जाता है यह दिखलाया गया है। लोभभाव असन्तोषजनित संक्लेशपना है, अतः कृमिराग आदि उदाहरणोंके उपन्यासद्वारा लोभका भी जैसा भाव है उसका समर्थन किया गया है । अब क्रोधके चारों ही स्थानोंका कालकी मुख्यतासे उदाहरणपूर्वक अर्थसाधन किया गया है ऐसा जो पूर्वसूत्रमें प्रतिज्ञा कर आये हैं उसके अर्थका विस्तारपूर्वक कथन करनेके लिये आगेके प्रबन्धको कहते हैं ____ * जो अन्तर्मुहूर्त काल तक क्रोधभावको धारण कर उसका वेदन करता है वह उदकराजिके समान क्रोधका वेदन करता है। ६५१. जो जीव अन्तर्मुहूर्त तक होनेवाले भावको धारण कर क्रोधका वेदन करता है वह उदकराजिके समान ही क्रोधका वेदन करता है, क्योंकि उदकराजिके स चिरकाल तक अवस्थानके विना उसी समय विलय देखा जाता है। वेदनमें आता हुआ यह क्रोधकषायरूप वेद जीवके कुछ भी संयमघातको नहीं करता, क्योंकि यह मन्द अनुभागस्वरूप होता है । किन्तु संयमको अत्यन्त शुद्धिका प्रतिबन्ध करता है, क्योंकि उसका प्रमादादिरूप मलके उत्पन्न करने में व्यापार होता है। १. ता०प्रतौ तद्धत्तं इति पाठः । २. ता०प्रती णिदरिसणेवणमओ इति पाठः ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy