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________________ १७२ जयधवलास हिदे कसायपाहुडे [ चउट्ठा ८ लब्भंति । एवमिंदियादिमग्गणासु वि जाणियूण पयदपरूवणा कायव्वा । तदो सोलसण्डं गाहात्ताणं समुक्तिणा समत्ता भवदि । * एदं सुतं । $ ३४. एवमेदं सोलससंखाविसेसिदं गाहासुत्तं समुक्कित्तिदमिदि वृत्तं हो । * एत्थ अत्थविहासा । ३५. एवं समुक्कित्तिदाणं गाहासुत्ताणमेतो अत्थविहासा कीरदि त्ति भणिदं हो । तत्थ ताव पुव्यमेव चउट्ठाणे ति पदस्स णिक्खेवपरूवणद्वमुवरिमं सुत्तपबंधमाह - * चउठ्ठाणे ति एक्कगणिक्खेवो च द्वाणणिक्खेवो च । $ ३६. 'चउट्ठाणस्से' ति पदस्स अत्थविसयणिण्णयजणणमेत्थ णिक्खेवो कीरदे । सो चणिक्खेवो दम्म विसए दुविहो होइ - 'णिक्खेवो द्वाणणिक्खेवो' इदि । तत्थ एक्कगणिक्खेवो णाम चदुसदस्स अत्थभावेण विवक्खियाणं लदास माणादिट्ठाणाणं कोहादिकसायाणं वा एक्केक्कं घेत्तूण णाम- दुवणादिभेदेण णिक्खेवपरूवणा । द्वाणणिक्खेवो नाम तेसिं अन्योगाढसरूवेण विविक्खियाणं वाचओ जो द्वाणसद्दो तस्स अत्थविसयणिण्णयजणणङ्कं णाम- दुवणादिभेदेण परूवणा । एवमेदेसु दोसु णिक्खेवेसु एकगणिraat youमेव गयत्थो त्ति जाणावेमाणो इदमाह - मनुष्यगति के सिवाय अन्य उक्त दो गतियोंमें केवल एकस्थानीय अनुभागका बन्ध और उदय नहीं प्राप्त होता । इसी प्रकार इन्द्रिय आदि मार्गणाओंमें भी जानकर प्रकृत प्ररूपणा करनी चाहिए । इस प्रकार इतने कथनके बाद सोलह गाथासूत्रों की समुत्कीर्तना समाप्त होती है । * यह गाथासूत्र है । $ ३४. इस प्रकार सोलह संख्या विशिष्ट इस गाथासूत्रका समुत्कीर्तन किया यह उक्त कथनका तात्पर्य है । * अब इसकी ( सोलह संख्याविशिष्ट इस गाथासूत्रकी ) अर्थविभाषा करते हैं । $ ३५. इस प्रकार उल्लिखित किये गये इन गाथासूत्रोंकी आगे अर्थविभाषा करते हैं। यह उक्त कथनका तात्पर्य है । उसमें सर्व प्रथम पहले ही 'चतुःस्थान' इस पदविषयक निक्षेपका कथन करनेके लिये आगेके सूत्रप्रबन्धको कहते हैं * 'चतुःस्थान' इस पदका एकैकनिक्षेप और स्थाननिक्षेप करना चाहिए । ३६. चतुःस्थान इस पदका अर्थविषयक निर्णय उत्पन्न करनेके लिये यहाँपर निक्षेप करते हैं और वह निक्षेप इस विषय में दो प्रकारका है -- एकैकनिक्षेप और स्थाननिक्षेप | उनमें से 'चतुः' शब्द के अर्थरूपसे विवक्षित लतासमान और दारुसमान आदि स्थानोंकी अथवा क्रोधादि कषायोंकी, एक-एकको ग्रहणकर नाम और स्थापना आदिके भेदसे निक्षेपरूप प्ररूपणा करना एकैकनिक्षेप है । तथा परस्पर मिलितरूपसे विवक्षित उन्हींका वाचक जो 'स्थान' शब्द है उसके अर्थविषयक निर्णयका ज्ञान करनेके लिये नाम और स्थापना आदि के भेद से प्ररूपणा करना स्थाननिक्षेप है । इस प्रकार इन दो निक्षेपोंमेंसे एकैकनिक्षेप पूर्व में ही गतार्थ है इस बातका ज्ञान कराते हुए इस सूत्र को कहते हैं
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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