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________________ १६८ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [चउट्ठाणं ८ ६२८. एसा गाहा वृत्तसेसासु संजमादिमग्गणासु पयदहाणाणं मग्गणाए बीजपदभूदा । तं जहा--'विरदीय अविरदीए' इच्चेदेण पढमावयवेण संजममग्गणा णिरवसेसा गहेयव्वा । 'तहा अणागारे' त्ति भणिदे दंसणमग्गणा घेत्तव्या । 'सागारे' त्ति भणिदे णाणमग्गणा गहेयव्वा । 'जोगम्हि य एवं भणिदे जोगमग्गणा घेत्तव्या । 'लेस्साए' त्ति वयणेण लेस्समग्गणाए गहणं कायव्वं । एत्थतण 'चेव' सद्देणावुत्तसमुच्चयटेण वुत्तसेससव्वमग्णाणं संगहो कायव्यो। तदो एदेसु मग्गणाभेदेसु कदमं ठाणं होइ त्ति पुव्वं व पुच्छाहिसंबंधो एत्थ वि कायव्यो । एदस्स णिण्णयमुवरि कस्सामो । (३१) कं ठाणं वेदंतो कस्स व ठाणस्स बंधगो होइ। कं ठाणमवेदंतो अबंधगो कस्स ठाणस्स ॥४॥ $ २९. एदं गाहासुत्तमोघेणादेसेण च चउण्हं कसायाणं सोलसण्हं ठाणाणं बंधोदएहिं सण्णियासपरूवणट्ठमागयं । तं कधं ? 'कं ठाणं वेदंतो' एदेसि सोलसण्हं ट्ठाणाणं मज्झे कदमं हाणमणुभवंतो 'कस्स हाणस्स बंधगो होइ', किमविसेसेण सव्वेसिमाहो अस्थि को विसेसो त्ति पुच्छा कदा होइ। 'कं ठाणमवेदंतो' कदमं ठाणमणणुभवंतो कस्स वा ट्ठाणस्स अबंधगो होइ त्ति एसो वि पुच्छाणिद्देसो चेव । एदस्स भावत्थो-- $ २८. यह गाथा पूर्व में कही गई मार्गणाओंसे शेष रही संयम आदि मागणाओंमें प्रकृत स्थानोंकी मार्गणाके लिये बीज पदभूत है । यथा-'विरदीय अविरदीए' इत्यादि प्रथम वचन द्वारा समस्त संयम मार्गणाको ग्रहण करना चाहिए । 'तहा अणागारे' ऐसा कहने पर दर्शनमार्गणाको ग्रहण करना चाहिए । 'सागारे' ऐसा कहने पर ज्ञानमार्गणाको ग्रहण करना चाहिए । 'जोगम्हि य' ऐसा कहने पर योगमार्गणाको ग्रहण करना चाहिए । तथा 'लेस्साए' इस वचनसे लेश्यामार्गणाको ग्रहण करना चाहिए । यहाँ गाथा सूत्रमें आया हुआ 'चेव' शब्द अनुक्त मार्गणाओंका समुच्चय करनेवाला होनेसे कही गई मार्गणाओंके अतिरिक्त शेष सब मार्गणाओंका संग्रह करना चाहिए । इसलिये इन मार्गणाके भेदोंमें कौन स्थान होता है इस प्रकार यहाँ भी पृच्छाका सम्बन्ध कर लेना चाहिए । इस विषयका निर्णय आगे करेंगे। किस स्थानका वेदन करनेवाला कौन जीव किस स्थानका बन्धक होता है और किस स्थानका वेदन नहीं करनेवाला कौन जीव किस स्थानका अबन्धक होता है ।।८४॥ $ २९. यह गाथासूत्र ओघ और आदेशसे चार कपायोंके सोलह स्थानोंसम्बन्धी बन्ध और उदयके सन्निकर्षका कथन करनेके लिए आया है। शंका-वह कैसे ? समाधान--'कं ठाणं वेदंतो' इस वचन द्वारा इन सोलह स्थानोंमेंसे किस स्थानका अनुभव करनेवाला जीव किस स्थानका बन्धक होता है, क्या अविशेषरूपसे सब स्थानोंका बन्धक होता है या कोई विशेष है यह पृच्छा की गई है। 'कं ठाणमवेदंतो' अर्थात् किस स्थानका अनुभव नहीं करनेवाला जीव 'कस्स वा ठाणस्स अबंधगों' अर्थात् किस स्थानका १. ता०प्रतो णिरुद्धट्ठाणो एदेण इति पाठः ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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