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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ चउट्ठाणं ८ कादूण जाव 'सव्वावरणीयं पुण' एसा गाहा त्ति माणकसायमहिकिच्च परूविदो सो चेव कमो अपरिसेसो मायाए वि चउण्हं द्वाणाणं जहाकम जोजेयव्यो । ण केवलं मायाए, किंतु णियमसा दु णिच्छएणेव लोभे वि परूवणिज्जो। ण केवलं मायालोभाणं चेव एसो कमो, किंतु सव्वं पि कोहकम्मं जं चदुसु हाणेसु णग-पुढविसमाणादिभेयभिण्णेसु द्विदं तं पि एदेणेव कमेण बोद्धव्वमिदि भणिदं होइ । एवमोघेण चउण्हं कसायाणं पादेक्कं चउब्भेयभिण्णेसु हाणेसु पयदपरूवणं कादूण संपहि गदियादिमग्गणासु एदेसि हाणाणं बंध-संतादिविसेसिदाणं गवेसणट्ठमुवरिमं गाहासुत्तपबंधमाह(२८) एदेसि ठाणाणं कदमं ठाणं गदीए कदमिस्से। बद्धं च बज्झमाणं उपसंतं वा उदिण्णं वा ॥१॥ $ २६. एदेसिमणंतरणिहिट्ठाणं सोलसण्हं ठाणाणमादेसपरूवणाए कीरमाणाए कदमिस्से गदीए कदमं ठाणं होइ । किमविसेसेण सव्वासु गदीसु सव्वेसिं हाणाणं संभवो आहो अत्थि को विसेसो त्ति पुच्छियं होइ । एदेसि हाणाणं बंध-संत-उदयोवसमेहिं विसेसिदाणं पादेक्कं गदीसु अणुगमो कायव्यो त्ति जाणावणट्ठमेदं वुत्तं 'बद्धं च बज्झमाणं' इच्चादि । 'बद्धं च' णिव्वत्तिदबंधं होदण बंधविदियादिसमएसु संतकम्मभावेणावद्विदं कदमं ठाणं कदमिस्से गदीए होदि ? 'बज्झमाणं' तकालियबंधपरिणामेण 'सव्वावरणीयं पुण' इस गाथा पर्यन्तकी गाथासूत्रोंमें मानकषायको अधिकृत कर कह आये हैं वही सब क्रम मायाकषायमें भी चारों स्थानों में क्रमसे योजित कर लेना चाहिए । केवल मायामें ही नहीं, किन्तु 'णियमसा' अर्थात् निश्चयसे लोभकषायमें भी कहना चाहिए। केवल लोभकषाय और मायाकषायमें ही यह क्रम नहीं है, किन्तु जो समस्त क्रोधकर्म नगसमान और पृथिवीसमान आदि भेदोंमें विभक्त चार स्थानोंमें स्थित है उसे भी इसी क्रमसे जान लेना चाहिए यह उक्त कथनका तात्पर्य है। इस प्रकार ओघसे चारों कषायोंमेंसे प्रत्येक कषायके चार भेदोंमें विभक्त स्थानों में प्रकृत कथन करके अब गति आदि मार्गणाओंमें बन्ध और सत्त्व आदिकी अपेक्षा विशेषताको प्राप्त हुए स्थानोंकी गवेषणा करनेके लिये आगेके गाथासूत्र प्रबन्धको कहते हैं इन पूर्वोक्त चारों स्थानोंमेंसे किस गतिमें कौन स्थान बद्ध है, कौन स्थान बध्यमान है, कौन स्थान उपशान्त है और कौन स्थान उदीर्ण है ॥८१॥ २६. अनन्तर पूर्व कहे गये इन सोलह स्थानोंकी आदेश प्ररूपणा करनेपर किस गतिमें कौन स्थान है ? क्या विशेषता किये विना सब गतियों में सब स्थान सम्भव हैं या कोई विशेषता है यह इस गाथासूत्रद्वारा पूछा गया है। भावसे विशेषताको प्राप्त हुए इन स्थानोंमेंसे प्रत्येक स्थानका गतियोंमें अनुगम करना चाहिए इस बातका ज्ञान करानेके लिये यह वचन कहा है-'बद्धं च बज्झमाणं' इत्यादि । 'बद्धं च' अर्थात् निवृत्त बन्ध होकर बन्धके बाद द्वितीयादि समयोंमें सत्त्व कर्मरूपसे अवस्थित कौन स्थान किस गतिमें होता है ? इसी प्रकार 'वज्झमाणं' अर्थात् तत्काल बन्धरूप
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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