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________________ गाथा ८०] एक्कारसगाहासुत्तस्स अत्थपरूवणा १६५ अणुगमं कस्सामो । तं जहा-सव्वावरणीयं पुण सव्वावरणीयमेव होइ। किं तमिदि वुत्ते 'उक्कस्सं दारुअसमाणे' जमुक्कस्समणुभागट्ठाणं तं णियमा सव्वघाइ त्ति बुत्तं होइ । ण केवलं दारुअसमाणे उकस्साणुभागो चेव सव्वघादी, किंतु दारुअसमाणस्स हेट्ठिमाणंतिमभागं मोत्तण सेसाणमणंताणं भागाणं सव्वघादित्तमदेण सुत्तेण णिद्दिट्टमिदि घेत्तव्वं, पुण सदस्स समुच्चयढे पवुत्तिअवलंबणादो। अथवा दारुअसमाणे उक्कस्सं सव्वावरणमिदि वुत्ते दारुअसमाणस्स अणंता भागा सव्वावरणं होति त्ति अत्थो घेत्तव्वो, अणंताणं भागाणमुक्कस्सत्तसिद्धीए विरोहाभावादो। तदो दारुअसमाणस्स अणंता भागा सव्वघादि त्ति सिद्धं । 'हेट्ठा देसावरणं' एदेण वयणेण दारुअसमाणस्स हेहिमाणंतिमभागो लदासमाणभागो च सव्वो देसघादि त्ति घेत्तव्यो, तस्स सव्वघायणसत्तीए अभावादो। 'सव्वावरणं च उवरिल्लं । एदेण वि दारुअसमाणादो उवरिल्लमट्ठिसमाणं सेलसमाणं च सव्वमेव णियमा सव्वघादि त्ति जाणावियं, तिव्य-तिव्वयरभावेणावट्टिदस्स तदुभयस्स तहाभावविरोहाभावादो। (२७) एसो कमो च माणे मायाए णियमसा दु लोभे वि। सव्वं च कोहकम्मं चदुसु ठाणेसु बोद्धव्वं ॥८॥ $२५. जो एसो कमो अणंतरमेव 'माणे लदासमाणे इच्चेदं गाहासुत्तमादि घातिसंज्ञाका अनुगम करेंगे । यथा-'सव्वावरणीयं पुण' अर्थात् सर्वावरणीय ही है। वह सर्वावरणीय कौन है ऐसा पूछने पर 'उक्कस्सं दारुसमाणे' अर्थात् दारुके समान मानमें जो उत्कृष्ट अनुभागस्थान है वह नियमसे सर्वघाति है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। केवल दारुके समान मानमें उत्कृष्ट अनुभाग ही सर्वघाति नहीं है, किन्तु दारुके समान मानके सबसे प्रारम्भके अनन्तवें भागप्रमाण अनुभागको छोड़कर शेष अनन्त बहुभागप्रमाण अनुभाग सर्वघाति है यह इस सूत्र द्वारा निर्दिष्ट किया गया है ऐसा प्रकृतमें ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि सूत्रमें आये हुए पुनः शब्दकी समुच्चयरूप अर्थमें प्रवृत्तिका अवलम्बन लिया गया है। अथवा दारुके समान मान में उत्कृष्ट सवोवरण ऐसा कहनेपर दारुके समान मानका अनन्त बहभाग अनुभाग सर्वावरण है यह अर्थ यहाँ ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि अनन्त बहुभाग अनुभागके उत्कृष्टपनेकी सिद्धि होनेमें विरोधका अभाव है। इसलिये दारुके समान मानका अनन्त बहुभाग अनुभाग सर्वघाति है यह सिद्ध हुआ। 'हेट्ठा देसावरणं' इस वचनसे दारुके समान मानका अधस्तन अर्थात् सबसे प्रारम्भका अनन्तवाँ भाग अनुभाग और लताके समान अनुभाग सब देशघाति है ऐसा प्रकृतमें ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि उसमें सर्वघातिपनेरूप शक्तिका अभाव है । 'सव्वावरणं च उवरिल्लं' इस वचनसे भी दारुके समान अनुभागसे आगेका अस्थिके समान और शैलके समान सब अनुभाग नियमसे सर्वघाति है ऐसा ज्ञान कराया गया है, क्योंकि यह दोनों प्रकारका अनुभाग तीव्र और तीव्रतर भावसे अवस्थित है, इसलिये उसके वैसा होनेमें विरोध नहीं आता। जो यह क्रम पिछली सूत्र गाथाओंमें कह आये हैं वह सब मान, माया, लोभ तथा क्रोधसम्बन्धी चारों स्थानोंमें निरवशेषरूपसे नियमसे जानना चाहिए ॥८॥ $ २५. जो यह क्रम अनन्तर पूर्व ही 'माणे लदासमाणे' इत्यादि गाथासूत्रसे लेकर
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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