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________________ १६० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ चउट्ठाणं ८ १७. संपहि माणस्स चउण्हं द्वाणाणं परत्थाणप्पाबहुअपरूवणद्वमुवरिमगाहासुत्तमोइण्णं(२३) णियमा लदासमादो दारुसमाणो अणंतगुणहीणो। सेसा कमेण हीणा गुणेण णियमा अणंतेण ॥७-७६॥ १८. पुव्वसुत्तादो माणग्गहणमिहाणुवट्टदे, पदेसग्गेणे त्ति च, तेणेवमहिसंबंधो कायव्यो । णियमा णिच्छएण लदासमाणादो माणादो दारुअसमाणो माणो पदेसग्गेणाणंतमुणहीणो होदि त्ति । एसो वुण एत्थ भावत्थो-लदासमाणसव्वपदेसपिंडादो दारुअसमाणसव्वपदेसपिंडो अणंतगुणहीणो त्ति । किं कारणं ? लदासमाणजहण्णवग्गणादो दारुअसमाणजहण्णवग्गणा पदेसग्गावेक्खाए अणंतगुणहीणा। पुणो लदासमाणविदियवग्गणादो दारुअसमाणविदियवग्गणा अणंतगुणहीणा। एवमणेण विधिणा गंतूण लदासमाणुक्कस्सबग्गणादो दारुअसमाणुक्कस्सवग्गणा अणंतगुणहीणा भयदि । एवं होदि त्ति कादूण लदासमाणसव्वपदेसपिंडादो दारुअसमाणसव्वपदेसपिंडो अणंतगुणहीणो त्ति सिद्धं । ण च तत्थतणफयाणं बहुत्तमवलंबिय पयदविवज्जासणं समान अनुभागमें प्रदेशों और अनुभागकी अपेक्षा स्वस्थान अल्पबहुत्वकी क्या व्यवस्था है इसका यहाँ सूत्र गाथा द्वारा स्पष्ट विवेचन किया गया है । इसी प्रकार मानकषायके शेष तीन प्रकारके अनुभागमें तथा क्रोधकषाय, मायाकषाय और लोभकषायके प्रत्येक चार-चार प्रकारके अनुभागमें इस प्रकार सब मिलाकर पन्द्रह प्रकारके अनुभागमें प्रदेशों और अनुभागकी अपेक्षा स्वस्थान अल्पबहुत्वका कथन करना चाहिए। $ १७. अब मानकषायके चारों स्थानोंके परस्थान अल्पबहुत्वका कथन करनेके लिये आगेका गाथासूत्र आया है ___ लता समान मानसे दारु समान मान प्रदेशोंकी अपेक्षा नियमसे अनन्तगुणा हीन है। शेष मान अर्थात् अस्थिसमान और शैलसमान मान भी क्रमसे अर्थात् पूर्व-पूर्वकी अपेक्षा आगे-आगेका मान प्रदेशोंकी अपेक्षा नियमसे अनन्तगुणा हीन है ॥७-७६॥ १८. पिछले गाथासूत्रसे प्रकृतमें 'मान' पदकी अनुवृत्ति कर लेनी चाहिए और 'पदेसग्गेण' पदकी भी अनुवृत्ति कर लेनी चाहिए, उसके अनुसार इस प्रकार सम्बन्ध करना चाहिए-णियमा' अर्थात् निश्चयसे लतासमानमानसेदारुसमान मान प्रदेशोंकी अपेक्षाअनन्तगुणा हीन होता है । इसका प्रकृतमें यह भावार्थ है कि लताके समान समस्त प्रदेशपिण्डसे दारुके समान समस्त प्रदेशपिण्ड अनन्तगुणा हीन है, क्योंकि लताके समान जघन्य वर्गणासे दारुके समान जघन्य वर्गणा प्रदेशपिण्डकी अपेक्षा अनन्तगुणी हीन होती है। तथा लताके समान दूसरी वर्गणासे दारुके समान दूसरी वर्गणा अनन्तगुणी हीन होती है। इस प्रकार इस विधिसे जाकर लताके समान उत्कृष्ट वर्गणासे दारुके समान उत्कृष्ट वर्गणा अनन्तगुणी हीन होती है। इस प्रकार होनेकी व्यवस्था है, इसलिये लताके समान समस्त प्रदेशपिण्डसे दारुके समान समस्त प्रदेशपिण्ड़ अनन्तगुणाहीन है यह सिद्ध हुआ। किन्तु वहाँके स्पर्धकोंके बहुतपने
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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