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________________ गाथा ७५ ] छट्ठगाहासुत्तस्स अत्थपरूवणा १५९ लदास माणट्टाणावट्टिदे जाव 'उक्कस्सा वग्गणा' चरिमफद्दयचरिमवग्गणा त्ति वृत्तं होइ । 'जहण्णादो हीणा च पदेसग्गे' अणुभागं पेक्खियूण जा जहण्णवग्गणा पढमफद्दयादिवग्गणा तत्तो णिरुद्धुकस्सवग्गणा पदेसग्गेण हीणा होदि ति वृत्तं होइ । केत्तियमेत्तेण हीणा त्ति वृत्ते 'गुणेण णियमा अणतेण' णिच्छएणानंतगुणहीणा होदि ति गहेयव्वा । किं कारणं १ लदासमाणजहण्णवग्गणादो अभवसिद्धिएहिंतो अनंतगुणं सिद्धाणंतभागमेयाणि उवरि गंतूण एगं पदेसगुणहाणिट्ठाणंतरमुप्पञ्जइ । पुणो अणेण विहिणा अभवसिद्धिएहिंतो अनंतगुणं सिद्धाणमणंतभागमेत्तगुणहीणाओ गंतूण तस्सेवप्पणो उक्कसवग्गणा होदि । एवं होदि ति कादूणुकस्सवग्गणा जहण्णवग्गणादो पदेसग्गं पेक्खियूणानंतगुणहीणा होदि त्ति णत्थि संदेहो । अणुभागेण पुण पयदजहण्णवग्गणादो उकस्वग्गणा णिच्छपणानंतगुणा त्ति घेत्तव्या । कथमेदं सुत्तेणाणुवहट्ठमुवलब्भदे ? ण, 'हीणा च पदेसग्गे' ति एत्थतण 'च' सद्देण पदेसग्गं पेक्खियूण जहा - उत्तेण गुणगारेण हीणा होदि अहिया च अणुभागेणे त्ति सुत्तत्थ संबंधावलंबनादो । एवं सेसपण्णारसहं पि द्वाणाणमप्पप्पणो जहण्णुक्कस्सवग्गणाओ घेत्तूण सत्थाणेण सणियासो काव्वो । समाधान – 'माणे' अर्थात् मानकषाय में । किस प्रकार के मानकषाय में ? लता के समान स्थान से युक्त मानकषाय में । 'उक्कस्सा वग्गणा' उत्कृष्ट वर्गणा अर्थात् अन्तिम स्पर्धककी अन्तिम वर्गणाके प्राप्त होने तक यह उक्त कथनका तात्पर्य है । 'जहण्णादो होणा च पदेसग्गे' - अनुभागकी अपेक्षा जो जघन्य वर्गणा है अर्थात् प्रथम स्पर्धककी आदि वर्गणा है उससे विवक्षित उत्कृष्ट वर्गणा प्रदेशोंकी अपेक्षा हीन होती है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । कितने प्रमाण में हीन होती है ऐसी आशंका होनेपर 'गुणेण णियमा अनंतेण' अर्थात् नियमसे अनन्तगुणी हीन होती है ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि लता के समान जघन्य वर्गणासे अभव्योंसे अनन्तगुणे और सिद्धोंके अनन्तवें भागमात्र स्पर्धक ऊपर जाकर एकप्रदेशगुणहानिस्थानान्तर उत्पन्न होता है । पुनः इस विधि से अभव्योंसे अनन्तगुणे और सिद्धों के अनन्तवें भागमात्र गुणहीन स्थान जाकर उसीकी अपनी उत्कृष्ट वर्गणा उत्पन्न होती है । इस प्रकार होती है ऐसा समझकर उत्कृष्ट वर्गणा जघन्य वर्गणासे प्रदेशोंकी अपेक्षा अनन्तगुणी हीन होती है इसमें सन्देह नहीं है। अनुभागकी अपेक्षा तो प्रकृत जघन्य वर्गणासे उत्कृष्ट वर्गणा निश्चयसे अनन्तगुणी है ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए । शंका — सूत्रद्वारा नहीं उपदिष्ट की गई यह बात कैसे उपलब्ध होती है ? समाधान नहीं, क्योंकि 'हीणा च पदेसग्गे इस प्रकार यहाँ आये हुए 'च' शब्दसे प्रदेशोंकी अपेक्षा पूर्वोक्त गुणकारके क्रमसे हीन होती है, परन्तु अनुभागकी अपेक्षा उसी गुणकारके कमसे अधिक होती है इस प्रकार यहाँ सूत्रका अर्थके साथ सम्बन्धका अवम्बन लिया गया है । इसी प्रकार शेष पन्द्रह स्थानोंकी अपनी-अपनी जघन्य और उत्कृष्ट वर्गणाओंको ग्रहणकर स्वस्थानकी अपेक्षा सन्निकर्ष करना चाहिए । विशेषार्थ- - मानकषाय में चार प्रकारका अनुभाग पाया जाता है । उसमेंसे लताके
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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