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________________ १५८ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [चट्ठा सो को हो । तत्थ ट्ठिदिं पडुच्च सव्वेसि द्वाणाणं हीणाहियभावगवेसणा णत्थि । किं कारणं १ सव्वेसु ट्ठिदिविसेसेसु अप्पप्पणो चउण्हं ट्ठाणाणमविसेसेण समुवलंभादो' । तं जहा - चालीससागरोवमकोडाको डिमेत्तकसायुकस्सट्ठिदिं बंधमाणस्स चरिमट्ठिदिएग-वि-ति-चउट्ठाण विसेसिददेससव्वधादिपरमाणू सव्वे चैव लब्भंति, आबाहाबाहिराणंतरजहणट्टिदीए वि तेसिमविसेसेण संभवो । एदेण कारणेण सुत्ते ट्ठिदिमस्सियूण पयदत्थपरिमग्गणा ण कया । एगट्ठाणाणुभागो उकस्सट्ठिदीए वि लब्भइ, चउट्ठाणाणुभागो जहणविदीए विलब्भइ त्ति एसो तहा ण षरूवेंतस्स सुत्तयारस्सा हिप्पायो ति भणिदं होइ । संपहि अणुभाग - पदेसे समस्सियूण सत्थाण- परत्थाणकमेण पयदट्ठाणाणमप्पा बहुअपरूवणङ्कं गाहासुत्तपबंधमणुसरामो (२२) माणे लदासमाणे उक्कस्सा वग्गणा जहण्णादो । हीणा च पदेसग्गे गुणेण णियमा अनंतेण ॥६-७५ ॥ $ १६. एसा सुत्तगाहा माणस्स लदासमाणद्वाणं घेत्तूण पदेसग्गेग सत्थाणप्पाबहुअपरिक्खण मोइण्णा । तं कथं १ 'माणे' माणकसाए । किंविधे १ 'लदासमाणे ' है' इस प्रकार यहाँ पृच्छाका निर्देश किया गया है। उनमें से स्थितिकी अपेक्षा सभी स्थानोंके - अधिकनेका अनुसन्धान नहीं है, क्योंकि सभी स्थितिविशेषोंमें अपने-अपने चारों स्थान विना विशेषता के पाये जाते हैं । यथा - कषायोंकी चालीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम स्थितिको बाँधनेवाले जीवके अन्तिम स्थिति में एकस्थानीय, द्विस्थानीय, त्रिस्थानीय और चतुःस्थानीय विशेषताको लिये हुए देशघाति और सर्वघाति सब प्रकार के परमाणु पाये जाते हैं तथा आबाधा बादकी समनन्तर जघन्य स्थितिमें भी वे अविशेषरूपसे सम्भव हैं । इस कारण से सूत्र में स्थितिकी अपेक्षा प्रकृत अर्थकी गवेषणा नहीं की गई है। एकस्थानीय अनुभाग उत्कृष्ट स्थिति में भी प्राप्त होता है और चतुःस्थानीय अनुभाग जघन्य स्थितिमें भी प्राप्त होता है यह उस प्रकार कथन नहीं करनेवाले सूत्रकारका अभिप्राय है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । अब अनुभाग और प्रदेशोंका आलम्बनकर स्वस्थान और परस्थानके क्रमसे प्रकृत स्थानोंके अल्पबहुत्वका कथन करनेके लिये गाथासूत्रके प्रबन्धका अनुसरण करते हैं लताके समान मानमें उत्कृष्ट वर्गणा अर्थात् अन्तिम स्पर्धककी अन्तिम वर्गणा जघन्य वर्गणासे अर्थात् प्रथम स्पर्धककी आदि वर्गणासे प्रदेशोंकी अपेक्षा नियमसे अनन्तगुणी हीन है । किन्तु अनुभागकी अपेक्षा जघन्य वर्गणासे उत्कृष्ट वर्गणा नियमसे अनन्तगुणी अधिक है || ६ - ७५ ॥ $ १६. यह सूत्रगाथा मानके लतासमान स्थानको ग्रहणकर स्वस्थान अल्पबहुत्वकी परीक्षा करनेके लिए आई है । शंका- वह कैसे ? १. ता० प्रती संभवुवलंभादो इति पाठः । २. ता० प्रती परिरक्खणट्टमोइण्णा इति पाठः ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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