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________________ गाथा ७३ ] तदिय- चउत्थगाहासुत्तस्स अत्थपरूवणा (१६) वंसीजण्डुगसरिसी मेंढविसाणसरिसी य गोमुत्ती । अवलेहणी समाणा माया वि चउव्विहा भणिदा ॥ ३-७२ ॥ १५५ १०. एसा तदियगाहा मायासंबंधीणं चउण्डं ठाणाणं णिदरिसणोवणय दुवारेण पदुपायणडुमागया । तं जहा - 'वंसीजण्डुगसरिसि' त्ति वृत्ते वेलुवमूल- जरढवं कंकुरगंठिसरिसी पढमा माया त्ति घेत्तव्वं । एदं च वंकभावस्स णिपडियारत्तमस्सियूण परूविदं । यथैव हि वेणुमूलग्रन्थिर्मृत्वा शीर्त्वापि नर्जुकर्तुं पार्यते एवं मायापरिणामोऽप्यतितीव्रवक्रभावपरिणतो निरुपक्रम इति । तहा 'मेंढविसाणसरिसि' त्ति विदिया मायावत्था । एसा पुचिल्लादो मंदाणुभागा, मेषविषाणस्यातिवलितवक्रतराकारेण परिणतस्याप्यग्नितापादिभिरुपायान्तरैः प्रगुणीकर्तुं शक्यत्वात् । तथा गोमूत्रसदृशी अवलेहनीसमाना च माया यथाक्रमं वक्रभावस्य हानितारतम्ययोगाद्वक्तव्येति । तत्रावलेहनी नाम दन्तधावनकाष्ठयष्टिर्जिह्वा मलशोधनी वा गृहीतव्या । (२०) किमिरागरत्तसमगो अक्खमलसमो य पंसुलेवसमो । हालिद्दवत्थसमगो लोभो वि चउव्विहो भणिदो ॥४-७३॥ $ ११. एसा चउत्थगाहा लोभस्स चउण्डं ठाणाणं' निदरिसणपरूवणट्टमागया । * माया भी चार प्रकारकी कही गई है— वाँसकी जड़के सदृश, मेढ़ेके सींगके सदृश, गोमूत्र के सदृश और अवलेखनीके सदृश || ३-७२॥ I $ १०. यह तीसरी गाथा मायासम्बन्धी चार स्थानोंके उदाहरण के निर्देश द्वारा कथन करनेके लिये आई है । यथा - 'वंसीजण्हुगसरिसी' ऐसा कहनेपर बाँसकी जड़की पुरानी कठोर टेढ़ी-मेढ़ी अंकुरयुक्त गाँठके सदृश पहली माया होती है ऐसा ग्रहण करना चाहिए। इसके टेढ़ापनके निष्प्रतीकारपनेका आश्रयकर उक्त उदाहरण दिया है । जैसे बाँसके जड़की गाँठ नष्ट होकर तथा शीर्ण होकर भी सरल नहीं की जा सकती है इसी प्रकार अति तीव्र वक्रभावसे परिणत मायापरिणाम भी निरुपक्रम होता है । उसी प्रकार 'मेंढविसाणसरिसी' अर्थात् मेढ़ेके सींगके सदृश मायाकी दूसरी अवस्था है । यह पूर्वकी मायासे मन्द अनुभागवाली होती है, क्योंकि अतिवलित वक्रतररूपसे परिणत हुए भी मेढ़ेके सींगको अग्निके ताप आदि दूसरे उपायोंद्वारा सरल करना शक्य है । तथा गोमूत्रसदृश और अवलेखनीसदृश मायाका क्रमसे वक्रभाव के हानिके तारतम्य के सम्बन्धसे कथन करना चाहिए । यहाँपर अवलेखनी पदसे दाँतोंको साफ करनेवाला लकड़ीका टुक्रड़ा विशेष अर्थात् दातुन या जीभके मलका शोधन करनेवाली जीभी लेना चाहिए । * लोभ भी चार प्रकारका कहा गया है— कृमिरागके सदृश, अक्षमलके सदृश, पांशुलेपके सदृश और हारिद्रवस्त्र के सदृश ||४-७३।। $ ११. यह चौथी गाथा लोभके चार स्थानोंके उदाहरणोंके कथन करनेके लिये आई १. ता० प्रती चउट्ठाणाणं इति पाठः ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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