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________________ १५६ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [चट्ठा " तं जहा - कृमिरागो नाम कीटविशेषः । स किल यद्वर्णमाहारविशेषमभ्यवहार्यते तद्वर्णमेव सूत्रमतिश्लक्ष्णमात्मनो मलोत्सर्गद्वारेणोत्सृजति तत्स्वाभाव्यात् । तेन च सूत्रेण वस्त्रान्तराण्यनेकवर्णानि महार्घाणि च तंतुवायै रूयन्ते । तेषां स वर्णरागो यद्यपि जलकलशसहस्रेणाव्यवच्छिन्नधारेण प्रक्षाल्यते, क्षारोद कैर्बहुविधैः क्षार्यते तथापि न शक्यते विश्लेषयितुं मनागपि, अतिनिकाचितस्वरूपत्वात् । किं बहुना, अग्निना दह्यमानस्यापि तदनुरक्तस्य वस्त्रस्य भस्मसाद्भावमापन्नस्य स वर्णरागोऽप्र हेयत्वात्तथैवावतिष्ठते । एवं लोभपरिणामोऽपि यस्तीव्रतरो जीवस्य हृदयवर्ती न शक्यते परासइतुं स उच्यते कृमिरागरक्तसमक इति । तव्यः...... $ १२. तथान्यो लोभपर्यायोऽस्मान्निकृष्टवीर्यस्तीत्रावस्था परिणतोऽक्षमलसमयि• 'रथचक्रस्य शकटतुम्बस्य वा धारणं' काष्ठमक्षमित्युच्यते । तस्य मलमक्षमलं । अक्षांजन स्नेहाद्रितमषीमलं इति यावत् । तद्यथैवातिचिक्कणत्वान्न शक्यते सुखेन विश्लेषयितुं तथैवायमपि लोभपरिणामो निधत्तरूपेण जीवहृदयमवगाढो न विश्लेषयितुं शक्य इति । $ १३. तृतीयो लोभप्रकारः पांशुलेपसम इत्यभिधीयते । यथैव पांशुलेपः पादलग्नः सुखेनापसार्यते सलिलप्रक्षालनादिभिर्न चिरमवतिष्ठते तद्वदयमपि लोभभेदो 1 है । यथा— कृमिरोग कीट विशेषको कहते हैं। वह नियमसे जिस वर्णके आहारको ग्रहण करता है वह उसी वर्णके अति चिक्कण डोरेको अपने मलके त्यागने के द्वारसे निकालता है, क्योंकि उसका वैसा ही स्वभाव है । और उस सूत्रद्वारा जुलाहे अति कीमती अनेक वर्णवाले नाना वस्त्र बनाते हैं । उनके उस वर्णके रंगको यद्यपि हजार कलशोंकी सतत धारा द्वारा प्रक्षालित किया जाता है, नाना प्रकार के क्षारयुक्त जलों द्वारा धोया जाता है तो भी उसे थोड़ा भी दूर करना शक्य नहीं है, क्योंकि वह अति निकाचितस्वरूप होता है । बहुत कहने से क्या, अग्निसे जलाये जानेपर भी भस्मपनेको प्राप्त हुए उस कृमिरागसे अनुरक्त हुए वस्त्रके उस वर्णका रंग कभी भी छूटने योग्य न होनेसे वैसा ही बना रहता है । इसी प्रकार जीवके हृदयमें स्थित अतितीव्र जो लोभपरिणाम भी कृश नहीं किया जा सकता वह कृमिरागके रंगके सदृश कहा जाता है । $ १२. तथा अन्य लोभ निकृष्ट वीर्यवाला और तीव्र अवस्थापरिणत होता है, वह अक्षमलके सदृश कहा जाता है । रथके चकेको या गाड़ीके तुम्बको धारण करनेवाली लकड़ी अक्ष कहलाती है और उसका मल अक्षमल है। अक्षांजनके स्नेह से गीला हुआ मषीमल यह उक्त कथनका तात्पर्य है । उसे जैसे अति चिक्कण होनेसे सुखपूर्वक दूर करना शक्य नहीं है उसी प्रकार यह भी लोभपरिणाम निधत्तस्वरूप होनसे जीवके हृदयमें अवगाढ़ होता है, इसलिए उसे दूर करना शक्य नहीं है । $ १३. तीसरा लोभका प्रकार धूलके लेपके सदृश कहा जाता है । जिस प्रकार पैर में लगा हुआ धूलिका लेप पानीके द्वारा धोने आदि उपायद्वारा सुखपूर्वक दूर कर दिया जाता १. ताप्रती - तुम्बस्यावधारणं इति पाठः ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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