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________________ गाथा ६९ ] सत्तमगाहासुत्तस्स अत्थपरूवणा १४५ विसेसाहियमिदि वृत्ते पढमसमये माणोवजुत्तो होदूण पविसमाणजीवरासीदो तम्मि चैव पढमसमये कोहोवजुत्तो होदूण पविसमाणजीवरासी विसेसाहिओ होदि ति अत्थो तव्वो । एवं विदियादिसमएस वि दोन्हं कसायोवजुत्तरासीणं सण्णियासं काढूण दव्वं जाव चरिमसमयोवजुत्ता ति । णवरि माणोवजुत्ताणं चरिमसमयादो उवरि विसेसाहियमद्धाणं गंतूण कोहोवजुत्ताणं चरिमसमयो होदि त्ति वत्तव्वं । एवं मायालोभाणं पिवतव्वं । जेणेवं समयं पडि ढुक्कमाणमाणोवजुत्तरासीदो पडिसमयसुवक्कममाणको होवजुत्तरासी विसेसाहिओ अद्धाणविसेसो च जेण अत्थि तेण कारणेण तदत्थासंगलिदजीवरासिसंचओ वि तदणुसारिओ चेव होदि ति सुव्वतमेवेदं विदियादिए साहणं । एदं वक्खाणमेत्थ पहाणभावेणावलंवेयव्वं, अविरुद्धसरूवत्तादो । * एसो विसेसो एक्केण उवदेसेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागपडिभागो । $ ३०९. जो एसो अणंतरपरुविदो विसेसो माणोवजुत्ताणं पवेसणादो कोहोवजुत्ताणं पवेसणयं विसेसाहियमिदि सो किं हेट्ठिमरासिस्स संखेजदिभागमेत्तो असंखेज्जदिभागमेत्तो वा अनंतभागमेत्तो वा ? असंखेज्जदिभागमेत्तो वि होंतो किमावलियाए क्रोधकषाय में उपयुक्त हुए जीवोंका प्रवेशकाल विशेष अधिक है ऐसा कहनेपर प्रथम समय में मानकषाय में उपयुक्त होकर प्रवेश करनेवाली जीवराशिसे उसी समयमें क्रोधकषायमें उपयुक्त होकर प्रवेश करनेवाली जीवराशि विशेष अधिक होती है यह अर्थ प्रकृतमें ग्रहण करना चाहिए । इसी प्रकार द्वितीयादि समयोंमें भी दोनों कषायोंमें उपयुक्त हुई जीवराशिका सन्निकर्ष करके अन्तिम समय में उपयुक्त हुई जीवराशिके प्राप्त होने तक ले जाना चाहिए । इतनी विशेषता है कि मानकषायमें उपयुक्त हुए जीवोंके अन्तिम समयसे ऊपर विशेष अधिक काल जाकर क्रोधकषाय में उपयुक्त हुए जीवोंका अन्तिम समय होता है ऐसा कहना चाहिए । इसी प्रकार मायाकषाय और लोभकषायकी अपेक्षा भी कथन करना चाहिए । यतः इस प्रकार प्रत्येक समय में प्राप्त होनेवाली मानकषायमें उपयुक्त हुई जीवराशिसे प्रत्येक समय में प्राप्त होनेवाली क्रोधकषाय में उपयुक्त हुई जीवराशि विशेष अधिक होती है और यतः अध्वान विशेष होता है इस कारणसे वहाँपर संकलित जीवराशिका संचय भी उसीके अनुसार ही होता है इस प्रकार यह द्वितीयादिका श्रेणिका साधन सुव्यक्त ही है । इस व्याख्यानका यहाँपर प्रधानरूपसे अबलम्बन करना चाहिए, क्योंकि यह व्याख्यान अविरुद्धस्वरूप है । * यह विशेष एक उपदेशके अनुसार पल्योपमके असंख्यातवें भागके प्रतिभागस्वरूप है। $ ३०९. मानकषायमें उपयुक्त हुए जीवोंके प्रवेशसे क्रोधकषायमें उपयुक्त हुए जीवोंका प्रवेश विशेष अधिक है इस बातको बतलानेवाला जो यह अनन्तर कहा गया विशेष है वह क्या अधस्तन राशिके संख्यातवें भागप्रमाण है या असंख्यातवें भागप्रमाण है या अनन्तवें भागप्रमाण है ? असंख्यातवें भागप्रमाण होता हुआ भी क्या आवलिके असंख्यातवें भागके १९
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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