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________________ १३८ जयधवलास हिदे कसायपाहुडे [ उवजोगो ७ भागो । अप्पाबहुअं सव्वत्थोवा णाणागुणहाणिट्ठाणंतरसलागाओ । एयदुगु णवडिहाणिट्ठाणं तरमसंखेज्जगुणं । को गुणगारो ? असंखेज्जा लोगा । एवं परंपरोवणिधासंबंघेण जवमज्झादो हेट्टिमोवरिमाणागुणहाणिसला गाणमियत्तावहारणं काढूण संपहि तसजीवविसयमेदं जवमज्झं पदुष्पाइदमिदि णिगमणट्ठमुत्तरमुत्तं भण * एवं पदुप्पण्णं तसाणं जवमज्भं । $ २९५. जमेदमणंतर परूविदं जवमज्झं तं तसाणं पदुप्पण्णं तसजीवे अहिकरिय परूविदमिदि वृत्तं होइ । एइंदिएस एसा जवमज्झपरूवणा किण्ण होइ ? ण, तत्थ थावरपाओग्गकसायुदयट्ठाणेसु एक्केकम्मि कसायुदयट्ठाणे तेसिमणंतसंखावच्छिण्णाणमण्णारिसेण जवमज्झसण्णिवेसेणावट्ठाणदंसणादो । तदो जत्थ विरहिदाविरहिदट्ठाण संभवो तत्थेव तसजीवविसये जवमज्झमेदं पदुप्पण्णमिदि सुसंबद्धमभिहिदं । अथवा पुव्वसुत्तेण जवमज्झादो हेट्ठिमोवरिमणाणागुणहाणिसलागाणं पमाणपरिच्छेददुवारेण जहण्णुकस्सजीवाणं पमाणं परूविदं । $ २९६. संपहि जहण्णुक्कस्तट्ठाणजीवेहिंतो जवमज्झजीवपमाणसाहणट्ठमिदं सुत्तमण्णमिद वक्खाणेयव्वं । तं जहा – एदमणंतरपरूविदजहण्णुक्कस्सट्ठाणजीवपमाणं जहाकमं मोवरमणाणागुणहाणिसला गाणमण्णोष्णन्भत्थरासिणा - बहुत्व - नाना गुणहानिस्थानान्तरशलाकाऐं सबसे थोड़ी हैं। उनसे एक द्विगुणवृद्धि और द्विगुणहानिस्थानान्तरशलाका असंख्यातगुणी है । गुणकार क्या है ? असंख्यात लोक गुणकार है । इस प्रकार परंपरोपनिधाके सम्बन्धसे यवमध्य से अधस्तन और उपरिम नाना गुणहानिशलाकाओं की संख्याका अवधारणकर अब यह यवमध्य त्रसजीवविषयक कहा गया है इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेके सूत्रको कहते हैं * इस प्रकार त्रसजीवोंके कषाय-उदयस्थान-सम्बन्धी यवमध्य उत्पन्न हो जाता है। $ २९५. जिस यवमध्यका पहले कथन कर आये हैं उसका त्रसजीवोंको अधिकृतकर 'पदुप्पणं' अर्थात् कथन किया यह उक्त सूत्रका तात्पर्य है । शंका — एकेन्द्रिय जीवों में यह यवमध्यप्ररूपणा क्यों नहीं होती ? - समाधान — नहीं, क्योंकि वहाँ स्थावरोंके योग्य कषाय उदयस्थानोंमेंसे एक-एक कषाय-उदयस्थानमें उनकी संख्या अनन्त होती है, इसलिए उनके यवमध्यकी रचनाका अवस्थान विसदृशरूपसे देखा जाता है, इसलिए जहाँपर जीवोंसे रहित और जीवोंसे युक्त स्थान सम्भव हैं वहीं त्रसजीवविषयक यह यवमध्य उत्पन्न हुआ है यह सुसम्बद्ध कहा है । अथवा पूर्व सूत्रद्वारा यवमध्यसे अधस्तन और उपरिम नाना गुणहानिशलाकाओंके प्रमाणका निर्णय करके उस द्वारा जघन्य और उत्कृष्ट स्थानके जीवोंका प्रमाण कहा गया है । $ २९६. अब जघन्य और उत्कृष्ट स्थानके जीवोंसे यवमध्यके जीवोंके प्रमाणको सिद्ध करनेके लिये यह सूत्र आया है ऐसा व्याख्यान करना चाहिए । यथा - यह अनन्तर कहा गया जघन्य और उत्कृष्ट स्थानके जीवोंका प्रमाण क्रमसे अधस्तन और उपरिम नाना गुणहानिशलाकाओं की अन्योन्याभ्यस्त राशि से 'पदुप्पण' अर्थात् गुणित होकर त्रसजीवोंका यवमध्य
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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