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________________ गाथा ६९] सत्तमगाहासुत्तस्स अत्थपरूवणा १३७ त्ति घेत्तूण तासिमण्णोण्णब्भत्थरासिणा जवमज्झजीवेसु पुव्वुत्तपमाणेसु ओवट्टिदेसु जहण्णपरित्तासंखेजवग्गस्स चउब्भागमेत्तमुक्कस्सट्ठाणजीवपमाणमागच्छइ । अह जइ तिरूवूणविरलणरूवधरिदमेत्ताओ उवरिमणाणागुणहाणिसलागाओ त्ति घेप्पंति तो तासिमण्णोण्णब्भत्थरासिणा जवमज्झट्ठाणजीवेसु भाजिदेसु जहण्णपरित्तासंखेजघणस्स अट्ठमभागमेत्तमुक्कस्सट्टाणजीवपमाणमागच्छइ । एवं णेदव्वं जाव तप्पाओग्गसंखेजरूवधरिदच्छेदणएहिं परिहीणजवमज्झच्छेदणयमेत्ताओ उवरिमणाणागुणहाणिसलागाओ जादाओ त्ति एवमेदेसु वियप्पेसु जिणदिट्ठभावेणुकस्सट्ठाणजीवपमाणमावलियाए असंखेजदिभागमेत्तं गहेयव्वं । अदो चेय उक्कस्सए कसायुदयट्ठाणे दो जीवा ति एवं पि सुत्तं संदिद्विपमाणं कादूण वक्खाणिदमिदि ण किंचि विरुज्झदे। तदो जवमज्झजीवाणं जत्तियाणि अद्धच्छेदणयाणि तेसिमसंखेजदिभागो हेट्ठा जवमज्झस्स गुणहाणिट्ठाणंतराणि तेसिमसंखेजाभागमेत्ताणि च उवरि जवमन्झस्स गुणहाणिहाणंतराणि त्ति सिद्धं । $ २९४. एत्थ परूवणा पमाणमप्पाबहुअं चेदि तीहिं अणियोगद्दारेहिं णाणेगगुणवड्डि-हाणिट्ठाणंतरसलागाणमणुगमो कायव्यो । तत्थ परूवणदाए अत्थि एगजीवदुगुणहाणिट्ठाणंतरं जाणाजीवदुगुणहाणिट्ठाणंतरसलागाओ च पमाणमेगगुणवड्डि. हाणिवाणंतरमसंखेजा लोगा, णाणागुणहाणिहाणंतरसलागाओ आवलियाए असंखेजदिगुणहानिशलाकाओंको ग्रहणकर उनकी अन्योन्याभ्यस्तराशिसे पूर्वोक्त प्रमाण यवमध्यसम्बन्धी जीवोंके भाजित करनेपर जघन्य परीतासंख्यातके वर्गके चौथे भागप्रमाण उत्कृष्ट स्थानसम्बन्धी जीवोंका प्रमाण आता है। और यदि तीन अंक कम विरलनकी जितनी संख्या है तत्प्रमाण उपरिम नाना गुणहानिशलाकाएँ हैं ऐसा ग्रहण करते हैं तो उनकी अन्योन्याभ्यस्त राशिद्वारा यवमध्यके जीवोंके भाजित करनेपर जघन्य परीतासंख्यातके घनके आठवें भागप्रमाण उत्कृष्ट स्थानसम्बन्धी जीवोंका प्रमाण प्राप्त होता है । इस प्रकार विरलनके तत्प्रायोग्य संख्यात अंकोंके प्रति प्राप्त अर्धच्छेदोंसे हीन यवमध्यके अर्धच्छेदप्रमाण उपरिम नाना गुणहानिशलाकाओंके होने तक ले जाना चाहिए। इस प्रकार इन विकल्पोंमें जिनेन्द्र देवने जैसा देखा हो उसके अनुसार उत्कृष्ट स्थानके जीवोंका प्रमाण आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण ग्रहण करना चाहिए । और इसीलिए उत्कृष्ट कषाय उदयस्थानमें दो जीव हैं इस प्रकार इस सूत्रका भी संदृष्टिका प्रमाण करके व्याख्यान किया है, इसलिए कुछ भी विरुद्ध नहीं है। अतः यवमध्यके जीवोंके जितने अर्धच्छेद होते हैं उनके असंख्यातवें भागप्रमाण यवमध्यके अधस्तन गुणहानिस्थानान्तर होते हैं और उनके असंख्यात बहुभागप्रमाण यवमध्यके उपरिम गुणहानिस्थानान्तर होते हैं यह सिद्ध हुआ। $२९४. यहाँपर प्ररूपणा, प्रमाण और अल्पबहुत्व इन तीन अनुयोगद्वारोंके आलम्बनद्वारा नाना और एक गुणवृद्धिशलाकाओं और गुणहानिशलाकाओंका अनुगम करना चाहिए । उनमेंसे प्ररूपणाकी अपेक्षा एक जीव द्विगुणहानिस्थानान्तर और नाना जीव द्विगुणहानिस्थानान्तर शलाकाएँ हैं। प्रमाण-एक गणवृद्धि और गुणहानिस्थानान्तर असंख्यात लोकप्रमाण है तथा नाना गुणहानिस्थानान्तरशलाकाएँ आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। अल्प
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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