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________________ १३९ गाथा ६९] सत्तमगाहामुत्तस्स अत्थपरूवणा पदुप्पण्णं गुणिदं संतं तसाणं जवमज्झं होइ। जहण्णुक्कस्सट्ठाणजीवपमाणं जहाकम दोसु उद्देसेसु दृविय तत्थ जहण्णट्ठाणजीवपमाणे हेट्ठिमणाणागुणहाणिसलागमेत्तवारं दुगुणगुणगारेण गुणिदे उवरिमणाणागुणहाणिसलागमेत्तवारं च उक्कस्सट्ठाणजीवपमाणे दुगुणगुणगारेण गुणिदे जवमज्झट्ठाणजीवपमाणमुप्पजदि त्ति वुत्तं होइ । अहवा एवं जवमज्झछेदणयपमाणमणूणाहियं घेत्तूण विरलिय विगं कादण अण्णोण्णब्भत्थे कदे जवमज्झट्ठाणजीवपमाणमुप्पज्जदि त्ति एदस्स सुत्तस्सत्थो परूवेयव्यो, पदुप्पण्णसहस्स गुणगारपजायत्तेण रूढस्स इह ग्गहणादो। एवमणंतर-परंपरोवणिधाभेयभिण्णसेढिपरूवणा समत्ता। २९७. संपहि एदेणेव सुत्तपबंधेण सूचिदो अवहारो भागाभागो च जाणिय णेदव्वो। तदो अप्पाबहुअं-सव्वत्थोवा उक्कस्सए कसायुदयट्ठाणे जीवा । जहण्णए कसायुदयट्ठाणे जीवा असंखेजगुणा । को गुणगारो ? आवलियाए असंखेजदिभागो। हेट्ठिमणाणागुणहाणिसलागाहिं परिहीणुवरिमणाणागुणहाणिसलागाणमण्णोण्णब्थरासिगुणगारो त्ति जमुत्तं होइ । जवमज्झजीवा संखेजगुणा। को गुणगारो ? जहण्णपरित्तासंखेजयस्स अद्धमत्तो चउभागमेत्तो अट्ठभागमेत्तो तप्पाओग्गसंखेजरूवमेत्तो वा । कुदो एदं णव्वदे ? जहण्णट्ठाणादो उवरि रूवूणजहण्णपरित्तासंखेज्जहोता है। जघन्य और उत्कृष्ट स्थानके जीवोंके प्रमाणको क्रमसे दो स्थानोंमें स्थापितकर वहाँ जघन्य स्थानके जीवोंके प्रमाणको अधस्तन नाना गुणहानिशलाकाओंका जो प्रमाण है उतनी बार द्विगुण गुणकारसे गुणित करनेपर तथा उपरिम नाना गणहानिशलाकाओंका जो प्रमाण है उतनी वार उत्कृष्ट स्थानके जीवोंके प्रमाणको द्विगुणगुणकारसे गुणित करनेपर यवमध्यके प्रमाण उत्पन्न होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। अथवा यवमध्यके अर्धच्छेदोंके इस प्रमाणको न्यूनाधिकतासे रहितरूपसे ग्रहणकर और उसका विरलनकर तथा विरलनके प्रत्येक एकको दूनाकर परस्पर गुणा करनेपर यवमध्यस्थानके जीवोंका प्रमाण उत्पन्न होता है इस प्रकार इस सूत्रके अर्थका कथन करना चाहिए, क्योंकि 'पदुप्पण्ण' शब्दको 'गुणकार' अर्थमें रूढरूपसे यहाँ ग्रहण किया है। इस प्रकार अनन्तरोपनिधा और परम्परोपनिधाके भेदरूप श्रेणिप्ररूपणा समाप्त हुई। २९७. अब इसी सूत्र प्रबन्धद्वारा सूचित हुए अवहार और भागाभागका जानकर कथन करना चाहिए। उसके बाद अल्पबहुत्व है-उत्कृष्ट कषाय उदयस्थानमें जीव सबसे थोड़े हैं। उनसे जघन्य कषाय उदयस्थानमें जीव असंख्यातगुणे हैं। गुणकार क्या है ? आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण गुएन है। अधस्तन नाना गुणहानिशलाकाओंसे हीन उपरिम नाना गुणहानिशलाकाओंको अन्योन्याभ्यस्त राशि गुणकार है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। उनसे यवमध्यके जीव संख्यातगणे हैं । गुणकार क्या है ? जघन्य परीतासंख्यातका अर्घमागप्रमाण, चतुर्थभागप्रमाण, अष्टम भागप्रमाण अथवा तत्प्रायोग्य संख्यात अंकप्रयाण है। शंका-यह किस प्रमाणसे जाना जाता है ? समाधान-जघन्य स्थानसे ऊपर एक कम जघन्य परीतासंख्यातके अर्धच्छेदोंसे लेकर जीवोंका प्रमाण
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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