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________________ १३४ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे जोगो ७ कुदो एदं नव्वदे ! जहण्णपरित्तासंखेजयं विरलेदूण रूवं पडि तमेव दादूण वग्गिदसंवग्गिदकदे आवलिया समुप्पज्जदित्ति परियम्मवयणादो । पुणो एत्थेगरूवधरिदं मोण सेससव्वरूवधरिदजहण्णपरित्तासंखेज्जेसु अण्णोष्णन्भत्थेसु जवमज्झजीवपमाणं होइ । एवं होदि ति कादूण एदस्स आवलियाए असंखेज्जदिभागस्स छेदणयाणि उक्कस्ससंखेज्जविरलणमेत्तजहण्णपरित्तासंखेजच्छेदणएसु समुदिदेसु भवंति । जहणपरित्तासंखेज्जच्छेदएणहिं परिहीणावलियच्छेदणेसु गहिदेसु जवमज्झच्छेदणयाणि समुप्पजंति त्ति भणिदं होइ । $ २९१. संपहि एत्थेव एगरूवधरिदजहण्णपरित्तासंखेज्जच्छेदणयमेत्तीओ हेहिमणाणागुणहाणि सलागाओ ति घेत्तव्वं । सेसरूवूणुकस्ससंखेज विरलणमेत्तरूवोयरि दिजहण्णपरित्तासंखेज छेदणयाणि च घेत्णुवरिमणाणागुणहाणिसलागाओ होंति ि गहेयव्वं । एवं च घेप्पमाणे हेट्ठिमणाणागुणहाणिसला गाहिंतो उवरिमणाणागुणहाणि - सलागाओ संखेज्जगुणाओ चेव जादाओ, णासंखेजगुणाओ । ण चेदमिच्छिज्जदे, हेडिमाणागुणहाणि सलागाहिंतो उवरिमणाणागुणहाणिसलागाओ असंखेजगुणाओ ति पदुप्पायणपरेणेदेण सुत्तेण सह विरोहादो । तदो णेदं घडदि त्ति १ सच्चमेवेदं, जहण्णपरित्तासंखेजच्छेदणयमेत्तीस हेट्ठिमणाणागुणहाणिसला गासु घेप्पमाणीसु उवरिमणाणा शंका – यह किस प्रमाणसे जाना जाता है ? समाधान — क्योंकि जघन्य परीतासंख्यातका विरलनकर विरलित राशिके प्रत्येक एकपर उस राशिको देकर वर्गित संवर्गित करनेपर आवलि उत्पन्न होती है इस परिकर्मके वचनसे जाना जाता है । पुनः यहाँ एक अंकके प्रति प्राप्त राशिको छोड़कर शेष सब अंकोंके प्रति प्राप्त जघन्य परीतासंख्यातोंके परस्पर गुणित करनेपर यवमध्यके जीवोंका प्रमाण प्राप्त होता है । इस प्रकार होता है ऐसा समझकर आंवलिके इस असंख्यातवें भागके अर्धच्छेद उत्कृष्ट संख्यातके विरलनप्रमाण जघन्य परीतासंख्यातके अर्धच्छेदों में मिलानेपर होते हैं । जघन्य परीता - संख्यातके अर्धच्छेदोंसे हीन आवलिके अर्धच्छेदोंके ग्रहण करनेपर यवमध्यके अर्धच्छेद उत्पन्न होते हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है । $ २०१. अब इन्हीं मेंसे एक अंकके प्रति प्राप्त जघन्य परीतासंख्यातके अर्धच्छेदप्रमाण अधस्तन नाना गुणहानिशलाकाऐं होती हैं ऐसा ग्रहण करना चाहिए तथा एक अंक कम करके शेष उत्कृष्ट संख्यातप्रमाण विरलनोंके प्रति प्राप्त जघन्य परीतासंख्यातोंके अर्धच्छेदोंको ग्रहण कर उपरिम नाना गुणहानिशलाकाऐं होती हैं ऐसा ग्रहण करना चाहिए। और इस प्रकार ग्रहण करनेपर अधस्तन नाना गुणहां निशलाकाओंसे उपरिम नाना गुणहानिशलाकाऐं संख्यातगुणी ही होती हैं, असंख्यातगुणी नहीं । शंका – परन्तु यह इष्ट नहीं है, क्योंकि ऐसा स्वीकार करनेपर इस कथनका अधस्तन नाना गुणहानिशलाओंसे उपरिम नाना गुणहानिशलाकाऐं असंख्यातगुणी होती हैं इस प्रकार कथन करवाले इस सूत्र के साथ विरोध आता है, इसलिए यह घटित नहीं होता ? समाधान — यह कहना सत्य है, क्योंकि जघन्य परीतासंख्यातके अर्धच्छेदप्रमाण
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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