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________________ १३२ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ उवजोगो ७ पुव्वाइरियसंपदायविरोहप्पसंगादो । एवं संजादे एगो चेव जीवो सव्वत्थ अहिओ ऊणो वा होइ, हेट्ठिमणाणागुणहाणिसलागार्हितो उवरिमणाणागुणहाणिसलागाओ च असंखेजगुणाओ भवंति । गुणहाणिअद्धाणं पि सव्वत्थ सरिसमेव संजादं, गुणहाणिसलागाओ च सव्वसमासेणावलियासंखेजदिभागमेत्ताओ जादाओ। सव्वेसु हाणेसु जीवा पादेकमावलियाए असंखेजदिभागमेत्ता च जादा ति सव्वमेदं घडदे । एत्तियं पुण ण संजादं सव्वत्थावह्रिदो भागहारो होदि त्ति जहण्णट्ठाणसरिसजीवपमाणादो उवरिमभागहारस्स अद्धद्धकमेण परिहाणिदंसणादो होदु णामेदमणवद्विदभागहारत्तं, इच्छिज्जमाणत्तादो च । ण च सव्वत्थावढिदो चेव भागहारो त्ति संपदायो अस्थि, तहाणुवलंभादो । तदो जवमज्झादो हेट्ठा सव्वत्थ जहण्णट्ठाणजीवपमाणो अवडिदभागहारो जवमज्झादो उवरि वि जाव जहण्णट्ठाणजीवपमाणं पावइ ताव जहण्णट्ठाणजीवपमाणादो दुगुणमेत्तो अवविदभागहारो। तत्तो परमण वढिदो भागहारो अद्धद्धकमेण हीयमाणो गच्छइ त्ति एसो एत्थ परमत्थो। $२८९. अधवा जवमज्झादो हेट्ठा उवरि वि सव्वत्थ उक्कस्सट्टाणजीवमेत्तो अवट्ठिदभागहारो त्ति घेत्तूण परंपरोवणिधा जाणिय णेदव्वा, तहा परूवणे कीरमाणे गुणवड्डि-हाणिअद्धाणाणं हेडिमोवरिमाणमवद्विदभावसिद्धीए णिव्वाहमुवलंभादो सव्वत्थावद्विदभागहारब्भुवगमस्स वि एदम्मि पक्खे अविसंवाददसणादो। संपहि जवमज्झादो आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण जीव होते हैं उस प्रकार करना चाहिए, अन्यथा पूर्वाचार्योंका जो सम्प्रदाय चला आ रहा है उसके साथ विरोध होनेका प्रसंग प्राप्त होता है। ऐसा होनेपर सर्वत्र एक ही जीव अधिक या कम होता है और अधस्तन गुणहानिशलाकाओंकी अपेक्षा उपरिम गुणहानिशलाकाएँ असंख्यातगुणी बन जाती हैं, सर्वत्र गुणहानिअध्वान भी सदृश ही प्राप्त होता है, गुणहानिशलाकाएँ सब मिलाकर आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण हो जाती हैं तथा सब स्थानोंमेंसे प्रत्येक स्थानमें जीव आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण हो जाते हैं। इस प्रकार यह सब विधि बन जाती है। किन्त सर्वत्र अवस्थित भागहार है यह बात नहीं बनती, क्योंकि जघन्य स्थानके सदृश जीवोंके प्रमाणसे उपरिम भागहारकी अर्ध-अर्ध भागके क्रमसे हानि देखी जाती है तथा यह अनवस्थित भागहार होओ, क्योंकि यह इष्ट है । तथा सर्वत्र अवस्थित ही भागहार है ऐसा सम्प्रदाय नहीं है, क्योंकि वैसा पाया नहीं जाता। इसलिए यवमध्यसे पूर्व सर्वत्र जघन्य स्थानके जीवोंके प्रमाणवाला अवस्थित भारहार है तथा यवमध्यके ऊपर भी जघन्य स्थानके जीवोंके प्रमाणके प्राप्त होने तक जघन्य स्थानके जीवोंके प्रमाणसे दूना अवस्थित भागहार है। इसके आगे अनवस्थित भागहार आधे-आधेके क्रमसे हीन होता जाता है इस प्रकार यहाँपर परमार्थ है। $ २८९. अथवा यवमध्यसे पहले और आगे भी सर्वत्र उत्कृष्ट स्थानके जीवोंके प्रमाणवाला अवस्थित भागहार है ऐसा ग्रहण करके परंपरोपनिधाको जानकर ले जाना चाहिए, क्योंकि उस प्रकार प्ररूपणा करनेपर अधस्तन और उपरिम गुणवृद्धिअध्वान और गुणहानि अध्वानकी अवस्थितरूपसे सिद्धि निर्बाधरूपसे पाई जाती है तथा इस पक्षके स्वीकार करनेपर सर्वत्र अवस्थित भागहारका स्वीकार अविसंवादरूपसे देखा जाता है। अब यवमध्यसे
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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