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________________ १२६ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ उवजोगो ७ २७८. एत्तो उवरिमेसु सेसेसु विट्ठाणेसु उक्कस्सट्टाणपजंतेसु जीवा समयाविरोहेण णेदव्या त्ति वुत्तं होइ । जहा जवमज्झादो हेट्ठा वड्डी तहा तत्तो उवरि हाणी वि जहाकमं कायव्वा त्ति एसो एदस्स भावत्थो । णवरि हेडिमद्धाणादो उवरिमद्धाणमसंखेजगुणं, हेट्ठिमगुणवड्डिट्ठाणेहिंतो उवरिमगुणहाणिट्ठाणाणमसंखेजगुणत्तोवएसादो। अदो चेव जहण्णहाणजीवेहिंतो उकस्सट्ठाणजीवा असंखेजगुणहीणा त्ति एदस्सत्थविसेसस्स संदिट्टिमुहेण पदुप्पायणट्ठमुवरिमसुत्तमोइण्णं * जहण्णए कसायुदयट्ठाणे चत्तारि जीवा, उक्कस्सए कसायुदयहाणे दो जीवा। ___$ २७९. जइ वि जहण्णए कसायुदयट्ठाणे आवलियाए असंखेञ्जदिभागमेत्ता जीवा होंति तो वि य संदिट्ठीए तेसिं पमाणं चत्तारिरूवमेत्तमिदि घेत्तव्वं । उक्कस्सए वि कसायुदयहाणे दो जीवा त्ति संदिट्ठीए गहेयव्वा । ण संदिद्विपरूवणमेदमत्थो चेव एरिसो त्ति किण्ण वक्खाणिजदे ? ण, तहा वक्खाणे कीरमाणे उक्कस्सए कसायुदयट्ठाणे गुणिदकम्मंसिया वि जीवा आवलियाए असंखेजदिमागमेना होति त्ति एदेण सह विरोहप्पसंगादो, जवमज्झच्छेदणयाणमसंखेजदिभागमेतीओ हेट्ठा णाणागुणहाणिसलागाओ तेसिमसंखेजा भागा उवरिमणाणागुणहाणिसलागाओ त्ति एत्थेव पुरदो भणिस्समाण $ २७८. जो पूर्व में स्थान कह आये हैं उनसे आगेके उत्कृष्ट स्थान पर्यन्त शेष स्थानोंमें भी आगमानुसार जीव ले जाने चाहिए यह उक्त कथनका तात्पर्य है। जिस प्रकार यवमध्यसे पूर्वके स्थानोंमें वृद्धि बतलाई उसी प्रकार उससे आगेके स्थानोंमें क्रमसे हानि भी करनी चाहिए यह इस सूत्रका भावार्थ है। इतनी विशेषता है कि यवमध्यसे पूर्वके अध्वानसे आगेका अध्वान असंख्यातगुणा है, क्योंकि अधस्तन गुणवृद्धिस्थानोंसे उपरिम गुणहानिस्थान असंख्यातगुणे होते हैं ऐसा उपदेश पाया जाता है। और इसीलिये जघन्य स्थानके जीवोंसे उत्कष्ट स्थानके जीव असंख्यातगुणे हीन होते हैं इस प्रकार इस अर्थविशेषका संदृष्टिद्वारा कथन करनेके लिये आगेका सूत्र आया है * जघन्य कषाय-उदयस्थानमें चार जान हैं और उत्कृष्ट कषाय-उदयस्थानमें दो जीव हैं। $२७९. यद्यपि जघन्य कषाय-उदयस्थानमें आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण जीव होते हैं तो भी संदृष्टिमें उनका प्रमाण चार संख्यामात्र ग्रहण करना चाहिए । उत्कृष्ट कषायउदयस्थानमें भी दो जीव हैं इस प्रकार संदृष्टिमें ग्रहण करना चाहिए। शंका-यह संदृष्टिरूपसे कथन न होकर वास्तवमें इसी प्रकार है अर्थात् उक्त स्थानोंमें वास्तव में इतने ही जीव हैं ऐसा व्याख्यान क्यों नहीं करते ? समाधान-नहीं, क्योंकि उस प्रकारसे व्याख्यान करनेपर उत्कृष्ट कषाय-उदयस्थान में गुणितकौशिक जीव भी आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण होते हैं इस प्रकार उक्त कथनके साथ इस कथनका विरोध प्राप्त होता है। दूसरे यवमध्यके अर्धच्छेदोके असंख्यातवें भागप्रमाण अधस्तन नाना गुणहानिशलाकाएँ होती हैं और उनके असंख्यात बहुभागप्रमाण उपरिम नाना गुणहानिशलाकाएँ होती हैं इस प्रकार इसी प्रकरणमें आगे कहे जानेवाले
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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