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________________ गाथा ६९] सत्तमगाहासुत्तस्स अत्थपरूवणा १२७ परंपरोवणिधासुत्तेण बाहिजमाणत्तादो च । तदो जहण्णट्ठाणे उक्कस्सट्ठाणे च जीवा अत्थदो आवलियाए असंखेजदिभागमेत्ता होदण पुणो संदिट्ठीए चत्तारि दोण्णि चेदि गहेयव्वा त्ति एसो एत्थ सुत्तत्थपरमत्थो। २८०. एवमेदेसु जहण्णुक्कस्सकसायुदयट्ठाणजीवेसु आवलियाए असंखेजदिभागमेत्तेण सिद्धेसु जवमज्झजीवा आवलियाए असंखेजदिभागमेत्ता त्ति सिद्धमेवेदं, ण तत्थ संदेहो कायव्वो त्ति पदुप्पायणमुत्तरसुत्तमोइण्णं * जवमझजीवा आवलियाए असंखेजदिभागो। २८१. हेट्ठिमणाणागुणहाणिसलागाणमण्णोण्णब्भत्थरासिणा जहण्णट्ठाणजीवेसु गुणिदेसु जवमज्झजीवा समुप्पजंति उवरिमणाणागुणहाणिसलागाणमण्णोण्णभत्थरासिणा उक्कस्सट्ठाणजीवेसु च गुणिदेसु जवमज्झजीवा समुप्पजंति । तदो जवमझजीवा आवलियाए असंखेञ्जदिभागो त्ति एसो एत्थ सुत्तस्स भावत्थो। एवं अणंतरोवणिधा गदा । २८२. संपहि एदेणेव सुत्तेण सूचिदा परंपरोवणिधा वुच्चदे। तं जहाजहण्णकसायुदयट्ठाणजीवेहितो असंखेजलोगमेत्तकसायुदयट्ठाणाणि गंतूण दुगुणवड्डिदा । एवं दुगुणवडिदा दुगुणवड्डिदा जाव जवमझे ति । तेण परमसंखेज प्रमाण परम्परोपनिधासूत्रके साथ उक्त कथन बाधा जाता है, इसलिए जघन्य स्थानमें और उत्कृष्ट स्थानमें जीव वास्तवमें आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण होकर पुनः संदृष्टिमें क्रमसे चार और दो ग्रहण करने चाहिए यह प्रकृतमें इस सूत्रका वास्तविक अर्थ है। ६२८०. इस प्रकार जघन्य उदयस्थान और उत्कृष्ट उदयस्थानके ये जीव आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं यह सिद्ध होनेपर यवमध्यके जीव आवलिके असंख्यातवें भाग हा करना चाहिए इस प्रकार कथन करनेके लिये आगेका सूत्र आया है * यवमध्यके जीव आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं । ६२८१. अधस्तन नाना गुणहानिशलाकाओंको अन्योन्याभ्यस्तराशिसे जघन्य स्थानके जीवोंके गुणित करनेपर यवमध्य के जीव उत्पन्न होते हैं। तथा उपरिम नाना गुणहानिशलाकाओंकी अन्योन्याभ्यस्तराशिसे उत्कृष्ट स्थानके जीवोंके गणित करनेपर यवमध्यके जीव उत्पन्न होते हैं। इसलिये यवमध्यके जीव आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं इस प्रकार यह यहाँ सूत्रका भावार्थ है । इसप्रकार अनन्तरोपनिधा समाप्त हुई। २८२. अब इसी सूत्रद्वारा सूचित हुई परम्परोपनिधाका कथन करते हैं । यथा कषाय-उदयस्थानके जीवोंसे असंख्यात लोकप्रमाण कषाय-उदयस्थान जाकर जीव दूने हो जाते हैं । इस प्रकार यवमध्य तक जीव दूने दूने होते जाते हैं। उसके बाद असंख्यात १ ता० प्रती असंखेज्जदिभागा इति पाठः । २. ता. प्रती उपरिमेण इति पाठः ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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