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________________ गाथा ६९] सत्तमगाहासुत्तस्स अत्थपरूवणा ११७ $ २५७. संपहि एदेणत्थपदेणेत्थ जवमज्झपरूवणाए तत्थेमाणि छ अणियोगद्दाराणि पदव्वाणि भवंति–परूवणा जाव अप्पाबहुए त्ति । परूवणदाए जहण्णए उवजोगट्ठाणे अत्थि जीवा, विदिये उवजोगद्धट्ठाणे अत्थि जीवा । एवं जाव उक्कस्सए उवजोगद्धट्ठाणे अत्थि जीवा । पमाणं-जहण्णए उवजोगद्धट्ठाणे जीवा केत्तिया ? असंखेजसेढिमेत्तिया भवंति । विदिए वि उवजोगट्ठाणे जीवा असंखेजसेढिमेत्ता । एवं जाव उक्कस्सट्टाणे त्ति । . २५८. सेढिपरूवणा दुविहा–अणंतरोवणिधा परंपरोवणिधा च । अणंतरोवणिधाए जहण्णए उवजोगद्धवाणे जीवा थोवा। विदिये उवजोगद्धट्ठाणे जीवा विसेसाहिया आवलियाए असंखेजदिमागपडिभागेण । एवं विसेसाहिया विसेसाहिया जाव जवमज्झे त्ति । तेण परं विसेसहीणा विसेसहीणा जाव उक्स्सट्ठाणे त्ति । परंपरोवणिधाए जहण्णुवजोगद्धट्ठाणजीवेहितो आवलियाए असंखेजादिमागं गंतूण दुगुणवड्डिदा, एवं दुगुणवडिदा जाव जवमझे त्ति । तेण परं दुगुणहीणा दुगुणहीणा जाव उक्कस्सट्ठाणे त्ति । $२५९. एत्थ तिण्णि अणियोगदारेहिं परूवणा पमाणमप्पाबहुअं च । तत्थ परूवणाए अत्थि णाणादुगुणवड्डि-हाणिट्ठाणंतरसलागाओ एगदुगुणवड्डि-हाणिट्ठाणंतरं च। पमाणमेगदुगुणवड्डि-हाणिहाणंतरमावलियपढमवग्गमूलस्सासंखेजदिभागो । णाणादुगुण ६२५७. अब इस अर्थपदके अनुसार यहाँ यवमध्यकी प्ररूपणा करनेपर उस विषयमें प्ररूपणासे लेकर अल्पबहुत्व तकके ये छह अनुयोगद्वार ज्ञातव्य हैं। प्ररूपणाके अनुसार कथन करनेपर जघन्य उपयोगाद्धास्थानमें जीव हैं, दूसरे उपयोग अद्धास्थानमें जीव हैं। इसी प्रकार यावत् उत्कृष्ट उपयोग अद्धास्थानमें जीव हैं। प्रमाण अनुयोगद्वारके अनुसार कथन करनेपर जघन्य उपयोग अद्धास्थानमें जीव कितने हैं ? असंख्यात जगश्रेणिप्रमाण हैं। दूसरे भी उपयोग अद्धास्थानमें जीव असंख्यात जगश्रेणिप्रमाण हैं। इसी प्रकार उत्कृष्ट उपयोग अद्धास्थान तक जानना चाहिये । $२५८. श्रेणिप्ररूपणा दो प्रकारकी है-अनन्तरोपनिधा और परंपरोपनिधा। अनन्तरोपनिधाकी अपेक्षा जघन्य उपयोग अद्धास्थानमें जीव सबसे थोड़े हैं। उनसे दूसरे उपयोग अद्धास्थानमें विशेष अधिक हैं। विशेषका प्रमाण आवलिके असंख्यातवें भागका भाग देनेपर जो लब्ध आवे उतना है। इस प्रकार यवमध्यके प्राप्त होने तक विशेष अधिक विशेष अधिक जानना चाहिए। उसके बाद उत्कृष्ट स्थानके प्राप्त होने तक विशेष हीन, विशेष हीन जानने चाहिए । परम्परोपनिधाकी अपेक्षा विचार करनेपर जघन्य उपयोग अद्धास्थानके जीवोंसे आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण स्थान जाकर वे द्विगुणवृद्धिरूप हो जाते हैं। इसी प्रकार यवमध्यके प्राप्त होने तक द्विगुणवृद्धिरूप, द्विगुणवृद्धिरूप जानने चाहिए। उसके बाद उत्कृष्ट स्थानके प्राप्त होने तक द्विगुणहीन, द्विगुणहीन जानने चाहिए । ६२५९. यहाँ प्रकृतमें तीन अनुयोगद्वार हैं-प्ररूपणा, प्रमाण और अल्पबहुत्व । उनमेंसे प्ररूपणाकी अपेक्षा नाना द्विगुणवृद्धिस्थानान्तर और द्विगुणहानिस्थानान्तर शलाकाएँ हैं तथा एक द्विगुणवृद्धिस्थानान्तर और एक द्विगुणहानिस्थानान्तर शलाका है। प्रमाण-एक
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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