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________________ १०७ गाथा ६८] छट्टगाहासुत्तस्स अत्थपरूवणा परूवणाए चेव गयत्थत्तादो। ___ * लोभोवजत्ताणं मिस्सयकालो विसेसाहियो । $२३५. ११५९० । केत्तियमेत्तो विसेसो ? माय-णोमायकालेहिंतो लोभणोलोभकालेसु सोहिदेसु सुद्धसेसमेत्तो। तं च सुद्धसेसपमाणमेत्थ संदिट्ठीए एत्तियमेत्तमिदि घेत्तव्वं २१८ । 5 २३६. सव्वत्थ अप्पप्पणो काल-णोकालेसु अदीदकालादो सोहिदेसु सुद्धसेसो मिस्सयकालो होदि त्ति वत्तव्वं । सव्वेसिमदीदकालपमाणसंदिट्ठी एसा ११७०० । २३७. एवमेदेसि बारसण्हं सत्थाणपदाणमप्पाबहुअपरूवणा कया। संपहि सेसपरत्थाणपदाणं पि एदेसु बारससु पदेसु पवेसणं कादूण बादालीसपदपडिबद्धं परत्थाणप्पाबहुअंपि णेदव्वमिदि पदुप्पायणट्ठमिदमाह * एत्तो बादालीसपदप्पाबहुध कायव्वं । सुगम है, क्योंकि इससे पूर्व के सूत्रमें कथनके समय ही उसका व्याख्यान कर आये हैं। विशेषार्थ-माया नोमायाकाल ३२८, क्रोध-नोक्रोधकाल ९८४ । ९८४ - ३२८ = ६५६ विशेषका प्रमाण । क्रोधमिश्रकाल १०७१६, १०७१६ + ६५६ - ११३७२ माया मिश्रकाल । * उससे लोभकषायमें उपयुक्त हुए जीवोंका मिश्रकाल विशेष अधिक है। $ २३५. लोभमिश्रकाल ११५२० । शंका-विशेषका प्रमाण कितना है ? समाधान-माय-नोमायासम्बन्धी कालोंमेंसे लोभ-नोलोभसम्बन्धी कालोंको कम कर देने पर जो शेष रहे उतना है। यहाँपर संदृष्टिकी अपेक्षा उस शेषका प्रमाण इतना २१८ ग्रहण करना चाहिए। विशेषार्थ—माया-नोमायाकाल ३२८, लोभ-नोलोभकाल ११०; ३२८ - ११० = २१८ विशेषका प्रमाण । मायामिश्रकाल ११३७२; ११३७२ + २१८ = ११५९० लोभमिश्रकाल । २३६. सर्वत्र अतीत कालमेंसे अपने-अपने काल तथा नोकालको कम कर देनेपर जो शेष रहे उतना अपना-अपना मिश्रकाल होता है ऐसा यहाँ कहना चाहिए । सबके अतीत कालके प्रमाणकी अंकसंदृष्टि यह है-११७०० । विशेषार्थ-अतीत काल ११७००, मान-नोमानकाल २९५२, क्रोध-नोक्रोधकाल ९८४, माया-नोमायाकाल ३२८, लोभ-नोलोभकाल ११०। ११७००-२९५२ - ८७४८ मानमिश्रकाल । ११७०० - ९८४ = १०७१६ क्रोधमिश्रकाल, ११७०० - ३२८ = ११३७२ मायामिश्रकाल, ११७०० - ११० = ११५९० लोभमिश्रकाल । $ २३७. इस प्रकार इन बारह स्वस्थान पदोंके अल्पबहुत्वका कथन किया। अब शेष परस्थान पदोंको भी इन बारह पदोंमें प्रविष्ट करके ब्यालीस पदसम्बन्धी परस्थान अल्पबहुत्व भी जानना चाहिए इस तथ्यका कथन करनेके लिए इस सूत्रको कहते है * आगे ब्यालीस पदसम्बन्धी अल्पवहुत्व करना चाहिए ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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