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________________ १०५ गाथा ६८] छट्टमगाहासुत्तस्स अत्थपरूवणा * माणोवजुत्ताणं णोमाणकालो अणंतगुणो । $ २३१. २९१६ । एत्थ वि कारणमणंतरणिदिट्टमेव । * माणोवजुत्ताणं मिस्सयकालो अणंतगुणो । २३२. ८७४८ । किं कारणं णोमाणकालो णाम माणवदिरित्तसेसकसाएसु णिरुद्धजीवाणमवट्ठाणकालो । तदो तिण्हमद्धाणं समासादो जेण चउण्हमद्धाणं समूहो बहुओ तेण मिस्सयकालो पुव्विल्लकालादो अणंतगुणो त्ति गहेयव्वं । अण्णं च माणोवजुत्तवट्टमाणजीवरासिस्स अब्भंतरादो जइ वि एगो जीवो णिप्पिडियणण्णकसाये पविसइ तो वि माणस्स मिस्सयकालो णाम वुच्चइ । एवं जइ वि दो जीवा अण्णकसाएसु पविसंति तो वि माणमिस्सयकालो भवइ । एदेण विहिणा संखेजासंखेजाणंतवियप्पेहि माणस्स मिस्सयकालो लब्भइ । जदो एवमणंतवियप्पेहिं पयदकालोवलंमसंभवो तदो अणंतगुणो त्ति सिद्धं । * कोहोवजुत्ताणं मिस्सयकालो विसेसाहिओ। विशेषार्थ-लोभ-माया-क्रोध-मानकाल ५४, नोलोभकाल १०८, नोमायाकाल ३२४, तीनों कालोंका योग ४८६, ४८६४२-९७२ नोक्रोधकाल । * उससे मानकषायमें उपयुक्त हुए जीवोंका नोमानकाल अनन्तगुणा है । $ २३१. नोमानकाल २९१६ । कारणका कथन पहले कर आये हैं। उसे ही यहाँपर जानना चाहिए। विशेषार्थ—लोभ-माया-क्रोध-मानकाल ५४, नोलोभकाल १०८, नोमायाकाल ३२४, नोक्रोधकाल ९७२, चारों कालोंका योग १४५८ । १४५८४२ = २९१६ नोमानकाल । * उससे मानमें उपयुक्त हुए जीवोंका मिश्रकाल अनन्तगुणा है । $२३२. मानकषायसम्बन्धी मिश्रकाल ८७४८, क्योंकि मानकषायके सिवाय शेष कषायोंमें उपयुक्त हुए जीवोंके अवस्थान कालकी नोमानकाल संज्ञा है। इसलिए तीन कालोंके योगसे चार कालोंका योग बहुत होता है, अतः पूर्वके कालसे मिश्रकाल अनन्तगुणा है ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए । दूसरी बात यह है कि मानकषायमें उपयुक्त हुई वर्तमान जीवराशिसे यद्यपि एक जीव निकल कर अन्य कषायरूप परिणम जाता है तो भी मानकषायका मिश्रकाल कहा जाता है। इसी प्रकार यद्यपि दो जीव अन्य कषायरूप परिणम जाते हैं तो भी मानकषायका मिश्रकाल होता है। इस विधिसे संख्यात, असंख्यात और अनन्त प्रकारसे मानकषायका मिश्रकाल प्राप्त होता है। यतः इस प्रकार अनन्त प्रकारसे प्रकृत कालकी प्राप्ति सम्भव है,अतः यह काल अनन्तगुणा है यह सिद्ध हुआ। विशेषार्थ-लोभ-माया-क्रोध-मानकाल ५४, नोलोभकाल १०८, नोमायाकाल ३२४, नोक्रोधकाल ९७२, नोमानकाल २९१६, इन सब कालोंका योग ४३७४ । ४३७४४२ - ८७४८ मानमिश्रकाल। ___* उससे क्रोधकषायमें उपयुक्त हुए जीवोंका मिश्रकाल विशेष अधिक है ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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