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________________ १०४ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ उवजोगो ७ लोभगमणेण विणा सेसकसाएसु थोवावट्ठाणकालो पुव्वल्लकालादो बहुओ होइ, विसयबहुत्तेण तहाविहसंपत्तीए सुलहत्तदंसणाद्रो । तदो माणोवजुत्ताणं माणकालादो एसो कालो अणंतगुणो त्ति सिद्धं १०८। * मायोवजुत्ताणं णोमायकालो अणंतगुणो । $ २२९. ३२४, वट्टमाणसमयमायोवजुत्ताणमदीदकालम्मि मायमगंतूण सेस. कसाएसु चेवावट्ठाणकालो । एसो पुम्विन्लणोलोभकालं पेक्खियणाणंतगुणो । कधमेदं परिच्छिजदे ? पुविलविसयादो एदस्स विसयबहुत्तोवलंभादो। तं कधं ? पुग्विन्लविसयो णाम कोह-माण-मायासु अच्छणकालो । एसो पुण कोह-माण-लोभेसु अवट्ठाणकालो ति तेणाणंतगुणो जादो । रासीणं थोवबहुत्तं च एत्थ कारणं वत्तव्यं । * कोहोवजुत्ताणं णोकोहकालो अणंतगुणो। $ २३०. ९७२ । एत्थ नि कारणमणंतरपरूविदमेव दट्ठव्वं । लोभकषायमें जानेके विना शेष कषायोंमें थोड़ा अवस्थान काल पूर्व के कालसे बहुत है, क्योंकि विषयका बाहुल्य होनेसे उस प्रकारसे कालकी प्राप्ति सुलभ देखी जाती है। इसलिए मानकषायमें उपयुक्त हुए जीवोंके मानकालसे यह काल अनन्तगुणा है यह सिद्ध हुआ। उसका प्रमाण विशेषार्थ लोभ-माया-क्रोधकाल १८, मानकाल ३६, दोनोंका योग ५४, ५४४२ - १०८ नोलोभकाल। __ * उससे मायाकषायमें उपयुक्त हुए जीवोंका नोमायाकाल अनन्तगुणा है । $ २२९. नोमायाकाल ३२४ । वर्तमान समयमें मायामें उपयुक्त हुए जीवोंका अतीत कालमें माया कषायरूप न परिणम कर शेष कषायोंमें ही जो अवस्थान काल है उसे नोमायाकाल कहते हैं । यह पूर्वके नोलोभकालको देखते हुए अनन्तगुणा है। शंका—यह किस प्रमाणसे जाना जाता है ? समाधान–पूर्वके विषयसे इसका विषय बहुत उपलब्ध होता है, इससे जाना जाता है कि नोलोभकालसे नोमायाकाल अनन्तगुणा है। शंका-वह कैसे? समाधान-क्योंकि क्रोध, मान और मायामें रहनेके कालको पूर्वका विषय कहते हैं, परन्तु यह क्रोध, मान और लोभमें रहनेका काल है, इसलिए उससे यह अनन्तगुणा हो गया है । तथा राशियों के अल्पबहुत्वको इसमें कारण कहना चाहिए। विशेषार्थ-लोभ-माया-क्रोध-मानकाल ५४, नोलोभकाल १०८, दोनोंका योग १६२; १६२४२ = ३२४ नोमायाकाल । * उससे क्रोधकषायमें उपयुक्त हुए जीवोंका नोक्रोधकाल अनन्तगुणा है। ६२३०. नोक्रोधकाल ९७२ । कारणका कथन पहले कर आये हैं। उसे ही यहाँपर जानना चाहिए। .
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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