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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ उवजोगो७ १९५. अप्पाबहुआणुगमेण दुविहो णिद्देसो-ओघेण आदेसेण य । ओषेण सव्वत्थोवा माणकसायोवजुत्ता जीवा । कोहकसायोवजुत्ता जीवा विसेसाहिया । मायकसायोवजुत्ता विसेसाहिया । लोभकसायोवजुत्ता विसेसाहिया। एवं तिरिक्खमणुस्सेसु । णिरयगदीए सव्वत्थोवा लोभोवजुत्ता जीवा । मायोवजुत्ता संखेजगुणा । माणोवजुत्ता जीवा संखेजगुणा। कोहोवजुत्ता संखेजगुणा । एवं देवगदीए वि । णवरि कोहादी वत्तव्वं । एवं जाव अणाहारि त्ति णेदव्वं । एवमेदेसु तेरससु अणुगमेसु संतपरूवणादीहिं कसायोवजुत्ताणं मग्गणं कादूण तदो किं कायव्वमिदि आसंकाए इदमाह * महादंडयं च कादूण समत्ता पंचमी गाहा।। $ १९६. चदुगदिसमासप्पाबहुअविसओ दंडओ महादंडओ ति एत्थ विवक्खिओ, एगेगगदिपडिबद्धदंडगेहिंतो एदस्स बहुविसयत्तेण तहाभावोवत्तीदो । सो च महादंडओ एवमणुगंतव्वो $ १९७. सव्वत्थोवा मणुसगदीए माणोवजुत्ता जीवा। कोहोवजुत्ता जीवा विसेसाहिया । मायोवजुत्ता जीवा विसेसाहिया। लोभोवजुत्ता जीवा विसेसाहिया । णिरयगदीए लोभोवजुत्ता० असंखेजगुणा। मायोव० संखेजगुणा । माणोव० $ १९५. अल्पबहुत्वानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । ओघसे मानकषायमें उपयुक्त हुए जीव सबसे थोड़े हैं। उनसे क्रोधकषायमें उपयुक्त हुए जीव विशेष अधिक हैं। उनसे माया कषायमें उपयुक्त हुए जीव विशेष अधिक हैं। उनसे लोभ कषायमें उपयुक्त हुए जीव विशेष अधिक हैं। इसी प्रकार तिर्यञ्चों और मनुष्योंमें जानना चाहिए । नरकगतिमें लोभकषायमें उपयुक्त हुए जीव सवसे थोड़े हैं। उनसे मायाकषायमें उपयक्त हए जीव संख्यातगणे हैं। उनसे मानकषायमें उपयुक्त हए जीव संख्यातगणे हैं। उनसे क्रोधकषायमें उपयुक्त हुए जीव संख्यातगुणे हैं। इसी प्रकार देवगतिमें भी जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि क्रोधकषायको आदि कर कथन करना चाहिए । इसी प्रकार अनाहारक मार्गणा तक जानना चाहिए । इस प्रकार इन तेरह अनुगमोंमें सत्प्ररूपणा आदिके द्वारा कषायोंमें उपयुक्त हुए जीवोंका अनुसन्धान करनेके बाद क्या करना चाहिए ऐसी आशंका होनेपर यह कहते हैं * और महादण्डक करके पाँचवीं गाथा समाप्त हुई । $ १०६. चारों गतियोंके समुदायरूप अल्पबहुत्वको विषय करनेवाले दण्डकको महादण्डक कहते हैं यह प्रकृतमें विवक्षित है, क्योंकि एक-एक गतिसे सम्बन्ध रखनेवाले दण्डकसे यह बहुतको विषय करनेवाला होनेसे इसे महादण्डकपना बन जाता है । और वह महादण्डक इस प्रकार जानना चाहिए $ १९७. मनुष्यगतिमें मानकषायमें उपयुक्त हुए जीव सबसे थोड़े हैं। उनसे क्रोधकषायमें उपयुक्त हुए जीव विशेष अधिक हैं। उनसे मायाकषायमें उपयुक्त हुए जीव विशेष अधिक हैं। उनसे लोभकषायमें उपयुक्त हुए जीव विशेष अधिक हैं। उनसे नरकगतिमें लोभकषायमें उपयुक्त हुए जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे मायाकषायमें उपयुक्त हुए जीव
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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