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________________ पंचमगाहासुत्तस्स अत्थपरूवणा गाथा ६७ ] खेत्त-पोसणं जाणिण णेदव्वं । $ १९२. कालानुगमेण दुविहो णिद्देसो- ओघेण आदेसेण य । ओघेण कोहादिकसायो जुत्ता केवचिरं कालादो होंति ? णाणाजीवे पडुच्च सव्वद्धा । एगजीवं पडुच्च जहण्णुक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं । एवं गदियादिसव्वमग्गणासु णेयव्वं । $ १९३. अंतराणुगमेण दुविहो णिदेसो- ओघेण आदेसेण य । ओघेण कोहादिकसायोवजुत्ताणं णाणाजीवे पडुच्च णत्थि अंतरं । एगजीवं पडुच्च जहण्णुकस्सेण अंतोमुहुतं । एवं गदियादिसु णेदव्वं । $ १९४. भागाभागाणुगमेण दुविहो णिद्देसो–ओघेण आदेसेण य । ओघेण कोहोजुत्ता सव्वजीवा • केवडिओ भागो १ चदुब्भागो देसूणो । एवं माण- मायोवजुत्ताणं पि वत्तत्व्वं । लोभोवजुत्ता सव्वजीवा ० केवडिओ भागो ? चदुब्भागो सादिरेओ । एवं तिरिक्ख- मणुस्सेसु । आदेसेण णेरइया कोहोवजुत्ता सव्वजीवा० केवडिओ भागो ? सखेजा भागा । सेसं संखेजदिभागो । एवं सव्वणेरइय० । देवगदीए लोभोवजुत्ता सव्वजीवा ० केवडिओ भागो ? संखेजा भागा। मायादिकसायोवजुत्ता जीवा संखेजदिभागो । एवं दव्वं जाव अणाहारि ति । हैं ? संख्यात हैं । इसी प्रकार अनाहारक मार्गणा तक जानना चाहिए । क्षेत्र और स्पर्शनका जानकर कथन करना चाहिए । $ १९२. कालानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है— ओघ और आदेश । ओघ क्रोधादि कषायों में उपयुक्त हुए जीवोंका कितना काल है ? नाना जीवोंकी अपेक्षा सर्वदा काल है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है । इसी प्रकार गति आदि सब मार्गणाओं में जानना चाहिए । $ १९३. अन्तरानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है - ओघ और आदेश | ओघसे क्रोधादि कषायोंमें उपयुक्त हुए जीवोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तरकाल नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त है । इसी प्रकार गति आदि मार्गणाओं में जानना चाहिए । $ १९४. भागाभागानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है - ओघ और आदेश । ओघसे क्रोधमें उपयुक्त हुए जीव सब जीवोंके कितने भागप्रमाण हैं ? कुछ कम चतुर्थभागप्रमाण हैं । इसी प्रकार मान और माया कषायमें उपयुक्त हुए जीवोंका भी कथन करना चाहिए । लोभकषाय में उपयुक्त हुए जीव सब जीवोंके कितने भागप्रमाण हैं ? साधिक चतुर्थ भागप्रमाण हैं । इसी प्रकार तिर्यन और मनुष्यों में जान लेना चाहिए । आदेशसे क्रोध कषायमें उपयुक्त हुए नारकी जीव सब नारकी जीवोंके कितने भागप्रमाण हैं ? संख्यात बहुभागप्रमाण हैं। शेष कषायों में उपयुक्त हुए जीव संख्यातवें भागप्रमाण हैं । इसी प्रकार सब नारकियों में जानना चाहिए । देवगति में लोभकषाय में उपयुक्त हुए जीव सब देव जीवोंके कितने भागप्रमाण हैं ? संख्यात बहुभागप्रमाण हैं । माया आदि कषायोंमें उपयुक्त हुए जीध संख्यातवें भागप्रमाण हैं । इसी प्रकार अनाहारक मार्गणा तक जानना चाहिए । १२
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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