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________________ गाथा ६८ ] छट्ठगाहा सुत्तस्स अत्थपरूवणा ९१ 1 1 संखेजगुणा । कोहोव • संखेज्जगुणा । देवगदीए कोहोवजुत्ता असंखेजगुणा | माणोवजुत्ता संखेजगुणा । मायोवजुत्ता संखेज्जगुणा । लोभोवजुत्ता संखेज्जगुणा । तिरिक्खगदी माणोवजुत्ता अनंतगुणा । कोहोव० विसेसाहिया । मायो० विसेसाहिया । लोभोवजुत्ता विसेसाहिया । एवमेसो गरमग्गणा विसओ एगो महादंडओ | एवमिंदियमग्गणा ए वि पंचण्हमिंदियाणं समासेण चदुकसायोवजुत्ताणमप्पाबहुए कीरमाणे विदिओ महादंडगो होइ । पुणो एदेणेव विहिणा कसायमग्गणं मोत्तूण सेससव्वमग्गणासु पादेकमेगेगमहादंडओ जाणिय णेयव्वो । एवं णीदे पंचमी गाहा समता भवदि । * 'जे जे जम्हि कसाए उवजुत्ता किण्णु भूदपुव्वा ते ' त्ति एदिस्से - छुट्टीए गाहाए कालजोणी कायव्वा । $ १९८. एदेण गाहापुव्वद्धमिदि सद्दपरमुच्चारिय पच्छद्धस्स वि देसा - मासयण्णाण बुद्धीए परामरसं काढूण तदो एदिस्से छुट्टीए गाहाए अत्थविहासणटुं कालजोणी कायव्याति णिहिं । कालो चेब जोणी आसयो पयदपरूवणार कायव्वो तिवृत्तं हो । कुदो एवं १ एदिस्से गाहाए वट्टमाणसमय-माणादिकसायोवजुत्ताण संख्यातगुणे हैं। उनसे मानकषाय में उपयुक्त हुए जीव संख्यातगुणे हैं। उनसे क्रोधकषायमें उपयुक्त हुए जीव संख्यातगुणे हैं। उनसे देवगतिमें क्रोधकषाय में उपयुक्त हुए जीव असंख्यातगुणे हैं। उनसे मानकषायमें उपयुक्त हुए जीव संख्यातगुणे । उनसे मायाकषायमें उपयुक्त हुए जीव संख्यातगुणे हैं। उनसे लोभकषाय में उपयुक्त हुए जीव संख्यातगुणे हैं। उनसे तिर्यञ्चगति में मानकषाय में उपयुक्त हुए जीव अनन्तगुणे हैं। उनसे क्रोधकषाय में उपयुक्त हुए जीव विशेष अधिक हैं। उनसे मायाकषायमें उपयुक्त हुए जीव विशेष अधिक हैं। उनसे लोभकषाय में उपयुक्त हुए जीव विशेष अधिक हैं । इस प्रकार यह गतिमार्गणाविषयक एक महादण्डक है । इसी प्रकार इन्द्रियमार्गणामें भी पाँच इन्द्रियोंके समुदायके साथ चार कषायों में उपयुक्त हुए जीवोंका अल्पबहुत्व करनेपर दूसरा महादण्डक होता है । पुनः इसी विधिसे कषायमार्गणाको छोड़कर शेष सब मार्गणाओंमेंसे प्रत्येकके आश्रयसे एक-एक महादण्डकको जानकर ले जाना चाहिए । इस प्रकार ले जाने पर पाँचवीं गाथा समाप्त होती है । * 'जो जो जीव वर्तमान समय में जिस कषायमें उपयुक्त हैं क्या वे अतीत कालमें उसी कषाय में उपयुक्त थे' इस छठी गाथाकी कालके आश्रयसे प्ररूपणा करनी चाहिए । $ १९८. इस द्वारा गाथाके पूर्वार्धका उल्लेखपूर्वक उच्चारण करके तथा इसके उत्तरार्ध का भी देशा मर्षक न्याय से बुद्धिद्वारा परामर्श करके अनन्तर इस छठी गाथाके अर्थका विशेष व्याख्यान करनेके लिए कालयोनि करना चाहिए । प्रकृत प्ररूपणा में काल ही योनि अर्थात् आश्रय करने योग्य है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । शंका- ऐसा क्यों है ?
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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