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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ उवजोगो ७ बहुअं पि साहेयव्वमिदि पदुप्पायणमुत्तरसुत्तं भणइ * एत्तो छत्तीसपदेहिं अप्पाबहुधे कायव्वं । $ १७७. एदम्हादो चेव सत्थाणप्पाबहुआदो साहेयूण परत्थाणप्पाबहुअं पि छत्तीसपदेहिं पडिबद्धं कायव्वमिदि वुत्तं होइ । तं जहा—उक्कस्सए कसायुदयट्ठाणे उक्कस्सियाए माणोवजोगद्धाए उवजुत्तजीवा थोवा । उक्कस्सए कसायुदयट्ठाणे उक्कस्सियाए कोधोवजोगद्धाए परिणदजीवा विसेसाहिया । एत्थ कारणं माणद्धादो कोधद्धा विसेसाहिया, तेण रासी वि तप्पडिभागो चेव होइ त्ति वत्तव्वं । विसेसो पुण पवाइजंतोवएसेणावलियाए असंखेजदिभागपडिभागिओ। एवमुवरिमपदेसु वि विसेसाहियपमाणमणुगंतव्वं । उक्कस्सए कसायुदयट्ठाणे उक्कस्सियाए मायोवजोगद्धाए परिणदजीवा विसेसाहिया । उक्कस्सए कसायुदयट्ठाणे उक्कस्सियाए लोहोवजोगद्धाए जीवा विसेसाहिया । उक्कस्सए कसायुदयट्ठाणे जहणियाए माणोवंजोगद्धाए जीवा असंखेजगुणा । को गुणगारो ? आवलियाए असंखेजदिभागो । उकस्सए कसायुदयट्ठाणे · जहणियाए कोहोवजोगद्धाए जीवा विसेसाहिया । उक्कस्सए कमायुदयट्ठाणे जहणियाए मायोवजोगद्धाए जीवा विसेसाहिया । उक्कस्सए कसायुदयट्ठाणे जहणियाए लोभोवजोगद्धाए जीवा विसेसाहिया । उक्कस्सए कसायुदयट्ठाणे अजहण्णमणुक्कस्सियासु माणोवजोगद्धासु इन तीनों कषायोंके अल्पबहुत्वके कथनमें कोई भेद नहीं है। अब इसी अल्पबहुत्वके आश्रयसे परस्थान अल्पबहुत्वकी भी सिद्धि कर लेनी चाहिए इस बातका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं * अब इससे आगे छत्तीस पदोंके द्वारा अल्पबहुत्व करना चाहिए। ६ १७७. इसी स्वस्थानअल्पबहुत्वसे साधकर छत्तीस पदोंसे सम्बन्ध रखनेवाला परस्थान अल्पबहुत्व करना चाहिये यह उक्त कथनका तात्पर्य है। यथा-उत्कृष्ट कषायउदयस्थानमें और उत्कृष्ट मानोपयोगकालमें उपयुक्त हुए जीव सबसे स्तोक हैं। उनसे उत्कृष्ट कषाय-उदयस्थानमें और उत्कृष्ट क्रोधोपयोगकालमें स्थित जीव विशेष अधिक हैं । यहाँपर मानके कालसे क्रोधके कालका विशेष अधिक होना इसका कारण है, इसलिए जीवराशि भी उसी प्रतिभागके हिसाबसे अधिक है ऐसा यहाँ कहना चाहिए। किन्तु विशेषका प्रमाण प्रवाह्यमान उपदेशके अनुसार आवलिके असंख्यातवें भागका भाग देनेपर जो लब्ध आवे उतना है। इसी प्रकार आगेके पदोंमें भी विशेष अधिकका प्रमाण जान लेना चाहिए। उनसे उत्कृष्ट कषाय-उदयस्थानमें और उत्कृष्ट मायोपयोगकालमें स्थित जीव विशेष अधिक हैं। उनसे उत्कृष्ट कषाय-उदयस्थानमें और उत्कृष्ट लोभोपयोगकालमें स्थित जीव विशेष अधिक हैं। उनसे उत्कृष्ट कषाय-उदयस्थानमें और जघन्य मानोपयोगकालमें स्थित जीव असंख्यातगुणे हैं । गुणकार क्या है ? आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण गुणकार है। उनसे उत्कृष्ट कषाय-उदयस्थानमें और जघन्य क्रोधोपयोगकालमें जीव विशेष अधिक हैं। उनसे उत्कृष्ट कषाय-उदयस्थानमें और जघन्य मायोपयोगकालमें जीव विशेष अधिक हैं। उनसे उत्कृष्ट कषाय-उदयस्थानमें और जघन्य लोभोपयोगकालमें जीव विशेष अधिक हैं। उनसे उत्कृष्ट कषाय उदयस्थानमें और अजघन्य-अनुत्कृष्ट मानोपयोगकालोंमें जीव असंख्यातगुणे
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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