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________________ ८३ गाथा ६६ ] चउत्थगाहासुत्तस्स अत्थपरूवणा जीवा असंखेञ्जगुणा । गुणगारो पुव्वत्तो चैव वत्तव्वो । उक्कस्सए कसायुदयट्ठाणे अणुक्कस्सिया को धोवजोगद्धासु जीवा विसेसाहिया । उक्कस्सए कसायुदयट्ठाणे अजहणमणुक्कस्सियासु मायोवजोगद्धासु जीवा विसेसाहिया । उक्कस्सए कसायुदट्ठाणे अजहण्णमणुक्कस्सियासु लोभोवजोगद्धासु जीवा विसेसाहिया । जहण्णए कसायुदयट्ठाणे उक्कस्सियाए माणोवजोगद्धाए जीवा असंखेजगुणा । को गुणगारो ! आवलियाए असंखेज्जदिभागो । जहण्णए कसायुदयट्ठाणे उक्कस्सिया० कोहोवजोगद्धा० जीवा विसेसाहिया । जहण्णए कसायुदयट्ठाणे उक्कस्सिया० मायोवजोगद्धा० जीवा विसेसाहिया । जहण्णए कसायुदयट्ठाणे उक्कस्सिया० लोभोवजोगद्धा० जीवा विसेसाहिया । जहण्णए कसायुदयट्ठाणे जहणिया० माणोवजोगद्धा० जीवा असंखेजगुणा । गुणगारो पुव्वं व वत्तव्वो । जहण्णए कसायुदयट्ठाणे जहण्णिया० कोहोवजोगद्धा० जीवा विसेसाहिया । जहण्णए कसायुदयट्ठाणे जहण्णिया० मायोवजोगद्धा० जीवा विसेसाहिया । जहण्णए कसायुयट्ठाणे जहणिया ० लोहोवजोगद्धा० जीवा विसेसाहिया । जहण्णए कसायुदयट्ठाणे अजहण्णमणुक्कस्सिया० माणोवजोगवा ० जीवा असंखेजगुणा । एत्थ वि सो चेव गुणगारो । जहण्णए कसायुदयट्ठाणे अजहण्णमणुकस्सिया कोहोजोगद्धासु जीवा विसेसाहिया । जहण्णए कसायुदयट्ठाणे अजहण्णमणुकस्सिया मायोवजोगद्धासु जीवा विसेसाहिया । जहण्णए कसायुदयट्ठाणे अजहण्णमणुक० लोभोवजोगद्धासु जीवा विसेसाहिया । अजहण्णमणुक० कसायुदयट्ठाणे ० हैं। गुणकार पूर्वोक्त ही कहना चाहिए। उनसे उत्कृष्ट कषाय-उदयस्थानमें और अजघन्यअनुत्कृष्ट क्रोधोपयोगकालोंमें जीव विशेष अधिक हैं। उनसे उत्कृष्ट कषाय-उदयस्थान में और अजघन्य- अनुत्कृष्ट मायोपयोगकालों में जीव विशेष अधिक हैं। उनसे उत्कृष्ट कषाय-उदयस्थान में और अजघन्य - अनुत्कृष्ट लोभोपयोगकालोंमें स्थित जीव विशेष अधिक हैं। उनसे जघन्य कषाय-उदयस्थानमें और उत्कृष्ट मानोपयोगकाल में जीव असंख्यातगुणे हैं । गुणकार क्या हैं ? आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण गुणकार है । उनसे जघन्य कषाय-उदयस्थान में और उत्कृष्ट प्रोवोपयोगकालमें जीव विशेष अधिक हैं। उनसे जघन्य कषाय - उदयस्थानमें और उत्कृष्ट मायोपयोगकालमें जीव विशेष अधिक हैं। उनसे जघन्य कषाय-उदयस्थानमें और उत्कृष्ट लोभोपयोगकालमें जीव विशेष अधिक हैं। उनसे जघन्य कषाय उदयस्थानमें और जघन्य मानोपयोगकालमें जीव असंख्यातगुणे हैं। गुणकार पहलेके समान कहना चाहिए । उनसे जघन्य कषाय - उदयस्थानमें और जघन्य क्रोधोपयोगकालमें जीव विशेष अधिक हैं । उनसे जघन्य कषाय-उदयस्थानमें और जघन्य मायोपयोगकालमें जीव विशेष अधिक हैं । उनसे जघन्य कषाय- उदयस्थानमें और जघन्य लोभोपयोगकालमें जीव विशेष अधिक हैं। उनसे जघन्य कषाय - उदयस्थानमें और अजघन्य अनुत्कृष्ट मानोपयोगकालों में जीव असंख्यातगुणे हैं । यहाँपर भी वही गुणकार है । उनसे जघन्य कषाय- उदयस्थानमें और अजघन्य-अनुत्कृष्ट क्रोधोपयोगकालोंमें जीव विशेष अधिक हैं। उनसे जघन्य कषाय-उदयस्थानमें और अजघन्य - अनुत्कृष्ट मायोपयोगकालोंमें जीव विशेष अधिक हैं। उनसे जघन्य कषायउदयस्थानमें और अजघन्य- अनुत्कृष्ट लोभोपयोगकालोंमें जीव विशेष अधिक हैं। उनसे अजघन्य-अनुत्कृष्ट कषाय- उदयस्थानोंमें और उत्कष्ट मानोपयोगकालमें जीव असंख्यातगुणे हैं । 1
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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