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________________ ७६ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ उवजोगो ७ सेढिमेत्ताणं जीवाणमेक्कम्मि कसायुवजोगद्धट्ठाणे समुवलंभादो । जइ वि सव्वेसु कसायोवजोगद्धट्ठाणेसु समपविभागेण तसजीवरासीए अवट्ठाणसंभवो णत्थि तो वि समकरणविहाणेणेदं तेरासियमणुगंतव्वं । एत्थ वि णिरयादिगदीणं पादेकणिरंभणं कादूण पयदपरूवणा समयाविरोहेणाणुगंतव्वा । तदो एत्थ वि सो चेव भावत्थो अणेगेसु कसायोवजोगद्धट्ठाणेसु णियमा सव्वा गदी उवजजदि त्ति । संपहि एदस्स चेव भावत्थस्स फुडीकरणद्वमुत्तरसुत्तं भणइ- . _* एवं भणिदं होइ सव्वगदीओ णियमा अणेगेसु कसायुदयहाणेसु अणेगेसु च कसायउवजोगद्धट्ठाणेसु त्ति । $१६४. कुदो पुव्वुत्तेण णाएण तहाभावसिद्धीए णिव्वाहमुवलंभादो । एवमेदं परूविय संपहि पयदविसये जीवप्पाबहुअपदुप्पायणट्ठमुवरिमं पबंधमाह * तदो एवं परूवणं कादूण णवहि पदेहि अप्पाबहुअं। $ १६५. एवं कसायुदयट्ठाणेसु उवजोगद्धट्ठाणेसु च जीवाणमवट्ठाणकमं परूविय तदो पयदविसये तसजीवाणमप्पाबहुअमिदाणिं कस्सामो त्ति भणिदं होदि । तं कथं कीरदि त्ति भणिदे ‘णवहिं पदेहिं' कायव्यमिदि णिदिट्ठ। काणि ताणि णवपदाणि ? क्रमसे देखनेपर एक-एक कषाय-उपयोगाद्धास्थानमें असंख्यात जगश्रेणिप्रमाण जीव उपलब्ध होते हैं । यद्यपि उक्त सभी कषाय-उपयोगाद्धास्थानोंमें समान प्रविभागसे त्रसजीवराशिका अवस्थान सम्भव नहीं है तो भी समीकरण विधानके अनुसार यह त्रैराशिक जानना चाहिए । यहाँपर भी नरकादि गतियोंमेंसे प्रत्येक गतिको विवक्षित कर आगमानुसार प्रकृत प्ररूपणा जानना चाहिए। इसलिए यहाँपर भी वही तात्पर्य है कि अनेक कषाय-उपयोद्धास्थानोंमें नियमसे सब गतियाँ प्रयुक्त होती हैं । अब इसी भावार्थका स्पष्टीकरण करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं... * इस प्रकार पूर्वोक्त कथनका यह तात्पर्य है कि सभी गतियाँ अनेक कषाय उदयस्थानोंमें और अनेक कषाय-उपयोगकालस्थानोंमें नियमसे हैं । ६ १६४. क्योंकि पूर्वोक्त न्यायसेउ स प्रकारसे सिद्धि निर्बाध पाई जाती है । इस प्रकार इसका कथन करके अव प्रकृत विषयमें जीव-अल्पाबहुत्वका कथन करनेके लिए आगेका प्रबन्ध कहते हैं * इस प्रकार उक्त कथन करके नौ पदों द्वारा अल्पबहुत्व करना चाहिए । $ १६५. इस प्रकार कषाय-उदयस्थानों में और उपयोगाद्धास्थानोंमें जीवोंके अवस्थानक्रमका कथन करके तदनन्तर प्रकृत विषयमें इस समय त्रसजीवोंका अल्पबहुत्व करते हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है। वह कैसे किया जाता है ऐसी पृच्छा होनेपर नौ पदोंके द्वारा करना चाहिए यह निर्देश किया है। शंका-वे नौ पद कौन हैं ? १ आ०प्रतौ णिवाहणुवलंभादो इति पाठः ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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