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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ उवजोगो ७ ___* अथवा अणेगेसु कसायउदयहाणेसु अणेगेसु वा कसायउवजोगद्धहाणेसु का च गदी। .६१५९. अणेगेसु कसायउदयट्ठाणेसु अणेगेसु वा कसायोवजोगट्ठाणेसु एगसमयम्मि उवजुत्ता भवे इदि पुच्छाहिसंबंधो अहियारवसेणेत्थ वि जोजेयव्यो । * एसा पुच्छा। $ १६०. एसा अणंतरपरूविदा दुविहा पुच्छा एदम्मि गाहासुत्ते पडिबद्धा त्ति भणिदं होदि । एवमेदम्मि उवदेसे पुच्छाभेदमुवसंदरिसिय संपहि एदिस्से पुच्छाए णिण्णयकरणट्ठमिदमाह * अयं णिद्द सो। ६१६१. सुगमो। * तसा एक्केकम्मि कसायुक्यहाणे आवलियाए असंखेजदिभागो । १६२. सो च दुविहो णिदेसो-कसायुदयहाणविसयो कसायोवजोगद्धट्ठाणविसयो च। तत्थ ताव कसायुदयट्ठाणेसु तसजीवे अस्सियूण पयदपरूवणट्ठमेदं सुत्तमोइण्णं । तं जहा-तसकाइया जीवा एककम्मि कसायुदयट्ठाणे उकस्सेण आवलि __* अथवा अनेक कषाय उदयस्थानोंमें अथवा अनेक कषाय-उपयोगाद्धास्थानोंमें कौन गति उपयुक्त होती है। $ १५९. अनेक कषाय-उदयस्थानोंमें अथवा अनेक कषायोपयोगाद्धास्थानोंमें एक समयमें उपयुक्त कौन गति होती है इस प्रकार अधिकारके वशसे यहाँ पर भी पृच्छाका सम्बन्ध कर लेना चाहिए। * यह पृच्छा है। $ १६० यह अनन्तर पूर्व कही गई दो प्रकारकी पृच्छाएं इस गाथासूत्रसे प्रतिबद्ध हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है। इस प्रकार इस उपदेशमें पृच्छाभेदको दिखलाकर अब इस पृच्छाका निर्णय करनेके लिए इस सूत्रको कहते हैं * यह निर्देश है। $ १६१. यह सूत्र सुगम है। ___ * त्रसजीव एक-एक कषाय उदयस्थानमें अवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण होते हैं। $ १६२. यह निर्देश दो प्रकारका है-कषाय-उदयस्थानविषयक और कषायोपयोगाद्धास्थानविषयक । वहाँ सर्व प्रथम कषाय-उदयस्थानोंमें त्रसजीवोंका आश्रयकर प्रकृत विषयकी प्ररूपणा करनेके लिए यह सूत्र आया है। यया-त्रसकायिक जीव एक-एक कषाय. उदयस्थानमें उत्कृष्टरूपसे आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण होते हैं। इस वचनसे त्रसजीव नियमसे अनेक कषाय-उदयस्थानोंमें रहते हैं इस बातका ज्ञान हो जाता है, क्योंकि आबलिके
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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