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________________ ७३ गाथा ६६] चउत्थगाहासुत्तस्स अत्थपरूवणा $ १५५. एगकालेणे त्ति एत्थतणकालसद्दो समवायवाचओ त्ति पुबिल्लपरूवणाए वक्खाणिदो । एत्थ पुण तहा ण घेप्पइ, किंतु एसो कालसद्दो कालोवजोगवग्गणाणं वाचओ । तदो 'एगकालेणे त्ति' वुत्ते एगेण कसायोवजोगद्धट्ठाणेणे त्ति भणिदं होदि। * एसा सण्णा। $ १५६. एसा अणंतरपरूविदा सण्णा पवाइजंतोवएसेण णायव्वा त्ति भणिदं होइ। * तदो पुच्छा। $ १५७. एदं सण्णाविसेसमवलंविय तदो गाहासुत्ताणुसारेण एसा पुच्छा कायव्या त्ति वुत्तं होइ । केरिसी सा पुच्छा त्ति आसंकाए उत्तरमाह * 'का च गदी एक्कम्हि कसायउदयट्ठाणे एकम्हि वा कसायउवजोगद्धहाणे भवे। . १५८. णिरयादिगदीणं मझे का णाम गदी कोहादीणमण्णदरकसायपडिबद्ध एक्कम्हि चेव कसायुदयट्ठाणे एकम्हि चेव वा कसायोवजोगद्धट्ठाणे एगसमएणुवजुत्ता •भवे किमेवंविहसंभवो अस्थि वा ण वेत्ति पुच्छिदं होदि। संपहि. 'विसरिसमुवजुजदे का च' त्ति एदं चरिमावयवमस्सियणविसरिसोवजोगविसयं विदियं पुच्छावकमाह $ १५५. एगकालेण' इस पदमें आया हुआ काल शब्द समवायवाचक है ऐसी पिछली प्ररूपणामें कह आये हैं। परन्तु यहाँ पर उस प्रकार ग्रहण नहीं करना है, किन्तु यह काल शब्द कालोपयोग वर्गणाओंका वाचक है। इसलिए 'एगकालेण' ऐसा कहनेपर उसका अर्थ एक कषायोपयोगाद्धास्थान होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। * यह संज्ञा है। $ १५६. अनन्तर पूर्व कही गई यह संज्ञा प्रवाह्यमान उपदेशके अनुसार जानना चाहिए यह उक्त कथनका तात्पर्य है। * इसके बाद पृच्छा करनी चाहिए । $ १५७. इस संज्ञाविशेषका अवलम्बन लेकर अनन्तर गाथासूत्रके अनुसार यह पृच्छा करनी चाहिए यह उक्त कथनका तात्पर्य है । वह पृच्छा किस प्रकार की है ऐसी आशंका होनेपर उत्तरका कथन करते हैं ___* एक कषाय उदयस्थानमें अथवा एक कषाय उपयोगाद्धास्थानमें कौन गति होती है। $ १५८. नरकादि गतियोंमेंसे कौन गति क्रोधादिकमेंसे अन्यतर कषाय-सम्बन्धी एक ही कषाय उदयस्थानमें अथवा एक ही कषायोपयोगाद्धास्थानमें एक समयमें उपयुक्त होती है । क्या इस प्रकारका सम्भव है अथवा नहीं है यह इस पृच्छाका तात्पर्य है। अव विसरिसमुवजुज्जदे का च' इस प्रकार इस अन्तिम अंशका आश्रय कर विसदृश उपयोगविषयक दूसरे पृच्छावाक्यको कहते हैं १०
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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