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________________ गाथा ६६] चउत्थगाहासुत्तस्स अत्थपरूवणा एवं चेव सत्तसु पुढवीसु णेदव्वं, विसेसाभावादो। संपहि देवगदीए वि एसा चेव परूवणा लोभादो आढविय विवजाससरूवेण णेदव्वा त्ति जाणावणट्ठमिदमाह- . * जहा णिरयगदीए कोहेण तहा देवगदीए लोभेण कायव्वा । १५१. जहा णिरयगइमग्गणाए कोहेण धुवभावमावण्णेण सह सेसकसाए ढोएदूण एग-दु-ति-चदुकसायोवजुत्तवियप्पपरूवणा कया एवं देवगदीए वि लोभेण सह पयदपरूवणा णिव्यामोहमणुमग्गियव्वा त्ति वुत्तं होइ । एवं ताव अपवाइजंतोवएसमस्सियूण गाहासुत्तत्थमेकेण पयारेण विहासिय पयदत्थोवसंहारवक्कमाह * एक्केण उवएसेण चउत्थीए गाहाए विहासा समत्ता भवदि। $ १५२. सुगममेदमुवसंहारवक्कं । संपहि विदियोवएसमस्सियूण गाहासुत्तत्थं विहासिदुकामो सुत्तपबंधमुत्तरं भणइ____ * पवाइज्जंतण उवएसेण चउत्थीए गाहाए विहासा। $ १५३. एत्तो पवाइजंतोवएसमवलंबिय एदिस्से चउत्थीए सुत्तगाहाए अत्थविहासणा कीरदि त्ति वुत्तं होइ । को वुण पवाइजंतोवएसो णाम ? वुच्चदे-वुत्तमेदं सव्वाइरियसम्मदो चिरकालमव्वोच्छिण्णसंपदायकमेणागच्छमाणो जो सिस्सपरंपराए है। इस प्रकार ओघसे नरकगतिमें कथन किया। इसी प्रकार सातों पृथिवियोंमें कथन करना चाहिए, क्योंकि विवक्षित ओघ प्ररूपणासे उसमें कोई भेद नहीं है । अब देवगतिमें भी लोभसे आरम्भकर पश्चादानुपूर्वीसे यही प्ररूपणा कहनी चाहिए इस बातका कथन करनेके लिए यह सूत्र कहते हैं____* जिस प्रकार नरकगतिमें क्रोधके साथ कथन किया है उसी प्रकार देवगतिमें लोभके साथ कथन करना चाहिए । $ १५१. जिस प्रकार नरकगति मार्गणामें ध्रुवपनेको प्राप्त हुए क्रोधके साथ शेष कषायोंका आश्रय कर एक, दो, तीन और चार कषायोंमें उपयुक्त हुए जीवोंके विकल्पोंका कथन किया है उसी प्रकार देवगतिमें भी लोभके साथ प्रकत प्ररूपणा निःसंशयरूपसे जान लेनी चाहिए यह उक्त कथनका तात्पर्य है। इस प्रकार सर्व प्रथम अप्रवाह्यमान उपदेशके अनुसार गाथासूत्रके अर्थका एक प्रकारसे व्याख्यान करके अब प्रकृत अर्थका उपसंहार वाक्य कहते हैं * एक उपदेशके अनुसार चौथी गाथाकी व्याख्या समाप्त होती है। ..$ १५२. यह उपसंहार वाक्य सुगम है । अब दूसरे उपदेशका आश्रय कर गाथासूत्रके अर्थका विशेष व्याख्यान करते हुए आगेके सूत्र प्रबन्धको कहते हैं * प्रवाह्यमान उपदेशके अनुसार चौथी गाथाका विशेष व्याख्यान करते हैं। $ १५३ आगे प्रवाह्यमान उपदेशका आलम्बन लेकर इस चौथी सूत्रगाथाके अर्थका विशेष व्याख्यान करते हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है। शंका-प्रवाह्यमान उपदेश किसे कहते हैं ? समाधान—यह कहा है कि जो सब आचार्योंके द्वारा सम्मत है, चिरकालसे अत्रुटित
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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