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________________ ७० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ उवजोगो ७ धुवं काढूण तेण सह माणादीणमण्णदरं घेत्तूण दुसंजोगे कीरमाणे समुप्पञ्जइत्ति भणिदं होइ । तं कथं ? कोह- माणोवजुत्ता वा, कोह-मायोवजुत्ता वा, कोह-लोभोवजुत्ता वा ति एवमेदेतिणि दुसंजोगभंगा ३ | संपहि तिकसायोवजुत्तवियप्पपटुप्पा यणट्टमाह - * जदि तिकसायो कोहेण सह अण्णदरो तिसंजोगो । $ १४९. तिन्हं कसायाणं संजोगो तिकसायो त्ति वुच्चदे । सो कथमुप्पाइ चि भणिदे कोण सह सेससायाणमण्णदरदोकसाए घेत्तूण तिसंजोगे कीरमाणे समुप्पञ्जदि त्ति भणिदं । तं कथं ? कोह -माण - मायोवजुत्ता वा, कोह- माण- लोभोवजुत्ता वा, कोहमाया- लोभोवजुत्ता वा ति । एवमेत्थ वि तिण्णि चैव भंगा ३ । संपहि चदुकसाय - पदुष्पायणट्टमाह I * जदि चउकसायो सव्वे चेव कसाया । $ १५०. सुगममेदं, सव्वे चैव कोहादिकसाए घेत्तूण चदुकसायोवजुत्तवियप्पुपत्ती विसंवादाभावादो । एवमेत्थ एक्को चैव भंगो होदि । एवं णिरयोघो परुविदो । यह निर्देश किया है । क्रोधराशिको ध्रुव कर उसके साथ मानादिकमेंसे अन्यतर कषायको ग्रहण कर दोका संयोग करने पर द्विसंयोगी भंग उत्पन्न होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । शंका- वह कैसे ? समाधान — क्रोध और मानमें उपयुक्त हुए जीव, अथवा क्रोध और मायामें उपयुक्त हुए जीव अथवा क्रोध और लोभमें उपयुक्त हुए जीव इस प्रकार ये तीन द्विसंयोगी भंग ३ होते हैं । अब तीन कषायों में उपयुक्त हुए जीवोंके विकल्पोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— * यदि तीन कषायों का संयोग है तो क्रोधके साथ अन्यतर दो कषाय इस प्रकार तीन कषायका संयोग होता है । $ १४९. तीन कषायका संयोग तीन कषाय ऐसा कहा जाता है । वह कैसे उत्पन्न होता है ऐसी पृच्छा होनेपर क्रोधके साथ शेष कषायोंमेंसे अन्यतर दो कषायोंको ग्रहणकर तीनका संयोग करने पर उत्पन्न होता है ऐसा कहा है । शंका- वह कैसे ? समाधान - क्रोध, मान और मायामें उपयुक्त हुए जीव, अथवा क्रोध, मान और लोभ में उपयुक्त हुए जीव अथवा क्रोध, माया और लोभमें उपयुक्त हुए जीव । इस प्रकार यहाँ पर भी तीन ही भंग ३ होते हैं । अब चार कषायोंके कथन करनेके लिए कहते हैं * यदि चार कषायका संयोग है तो सभी कषायें होती हैं । $ १५.० यह सूत्र सुगम है, क्योंकि सभी क्रोधादि कषायको ग्रहण कर चार कषायों में उपयुक्तरूप विकल्पकी उत्पत्तिमें विसंवाद नहीं है । इस प्रकार यहाँ पर एक ही भंग होता
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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