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________________ उत्तरपयडिजदीरयाए अणियोगदारपरूवणा १३१. देवेसु दस० छ० जह० अंतीमु०, सत्त० जह० एयस०, उक० सव्वेसिवित्तीससागरो० देरणाणि । णव० अट्ठ. जह० एयस०, उक्क. अंतोसु० । एवं भवणादि जाव गवगेवजा ति। एगवरिदर्शमविदा मात्रा अशुदिनादि जसाहात्ति शव छ० जहणमुक्क० अंतोमु० । अट्ट• सत्त० जह० एगस०, उक • अंतोमु० । एवं जावः । ___ णाणाजीवेहि भंगविचयो। कम एक पूर्वकोटि श्रोधग्ररूपणामें घटित करके बतलाया ही है। उसीप्रकार यहाँ पर भी घटित कर लेना चाहिए। अन्य विशेषता नहीं होनेसे अलगसे खुलासा नहीं किया। सात और छह प्रकृतियोंका उदीरक कोई उपशमसम्यग्दृष्टि मनुष्य मिथ्यात्वमें गया और पूर्वकोटिपृथक्त्व अधिक तीन पल्य काल तक वह उसके साथ रहा । फिर अन्तमें उसने उपशमसम्यक्त्वपूर्वक इन पदोंको पुनः प्राप्त किया यह सम्भव है, इसलिए यहाँ पर इन दो पदोंके उदीरकका उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटिपृथक्त्व अधिक तीन पल्य कहा है। पाँच प्रकृतियोंका उदीरक संयमासंयमी या संयमी ही होता है, और मनुष्य पर्यायके रहते हुए संयमासंयम या संयमका उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटिपृथक्त्वसे अधिक नहीं प्राप्त होता। यही कारण है कि पाँच प्रकृतियोंके उदीरकका उत्कृष्ट अन्तर उक्त कालप्रमाण कहा है। पर इतनी विशेषता है कि संयमासंयममें उत्कृष्ट अन्तरके लिए प्रथम बार उपशम सम्यग्दर्शनके साथ संयमासंयम ग्रहण कराना चाहिए और दूसरी बार ज्ञायिक सम्यक्त्वके साथ संथमासंयम ग्रहण कराना चाहिए। चार, दो और एक प्रकृतिके उदीरकका उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटिपृथक्त्वप्रमाण है यह स्पष्ट ही है। ६१३१. देवोंमें दस और छह प्रकृतियाँक उदौरकका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। सात प्रकृतियोंके उदीरकका जघन्य अन्तर एक समय है और सब पदोंका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम इकतीस सागर है । नी और आठ प्रकृतियोंके उदीरकका जयन्य अन्तर एक समय है, और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। इसीप्रकार भवनवासियासे लेकर नौ ग्रंयकतकके देवों में जानना चाहिए । किन्तु इतनी विशेषता है कि कुछ कम अपनी अपनी स्थिति कहनी चाहिए। अनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धि तकके देवों में नौ और छह प्रकृतियोंके उदीरक जीवका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। आठ और सात प्रकृतियोंके उदीरक जीवका जयन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर 'अन्तर्मुहूर्त है । इसीप्रकार अनाहारक मार्गणा तक जानना चाहिए। विशेषार्थ- सामान्य देवोंमें सामान्य नारकियोंके समान अन्तरकाल घटित कर लेना चाहिए। मात्र देवोंमें मिथ्यादृष्टि जीव नौवें अवेयक तक ही पाये जाते हैं और नौवें अवेयफके देवकी उत्कृष्ट आयु इकतीस सागर है। इसलिए यहाँ पर कुछ कम तेतीस सागरके स्थानमें कुछ कम इकतीस सागर कहा है। इसीप्रकार नौ ग्रंवेयक तकके देवाम यह अन्तरकाल बन जाता है, इसलिए उसे सामान्य देवोंके समान जानने की सूचना की है। भान इनमें दस, सात और छह प्रकृतियों के उदीरकका उत्कृष्ट अन्तर अपनी अपनी स्थितिप्रमाण ही प्राम होगा, इसलिए इस विशेषताकी अलगसे सूचना की है। नौ अनुदिशादिमें सम्यग्दष्टि ही होते हैं, इसलिए उनमें यह जानकर वहाँ सम्भव पदोंका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर कहा है। सुगम होनेसे उसका खुलासा नहीं किया है। * नाना जीवोंकी अपेक्षा भंगविचय !
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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