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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुरे [वेदगो तत्थेगपयडि पवेसमाणो कदमं पयडिं पवेसेदि ति आसकिय 'सिया कोहसंजलणं वा इचादि बुत्तं । कोहोदएण सेढिमारूढस्स वेदपढमहिदीए प्रावलियं पविट्ठाए तदो पडुडि कोधसंजलणमेकं चेव पवेसेदि तेणेव कोहपढमहिदीए आवलियं पवेसिदार तदो पहुडि माणसंजलणं पवसेदि । तस्सेव माणपढमविदीए आवलियपविद्वाए तदो पहुडि मायासंजलणं पसेदि । तदो मायासंजलणपढमछिदीए प्रावलियपविट्ठाए तदो पहुडि लोभसंजलणस्सेव पसगो होइ । अहवा अप्पप्पणो उदएण चडिदस्स वेदपढमद्विदीए श्रावलियपविहाए कोहसंजलणादीणं पवेसगो होदि ति वत्तच्च । एत्थ सम्वत्थ 'सिया' सदो एयंतावहारणपडिसेइफलो । 'वा' सहो 'च' वियप्पवाचो त्ति घेत्तव्वं । एवमेदे चत्तारि भंगा एयपयडिपवेसगस्स होइ त्ति उपसंहारवकमाह 8 एवं चत्तारि भंगा'नी सुविधासागर जी महाराज ८२. सुगम । दोपहं पपडी पवेसगस्स बारस भंगा। 5.८३. कुदो ? तिरह वेदाणमेकेकसजलणेण सह अक्सपरावतेण तेत्तियमेत- ' भंगुप्पत्तीए णिव्वाहमुबलभादो । तं कधं ? सिया पुरिसवेदं कोहसंजलणं च पवेसेदि । कीर्तना अनुयोगद्वारमें कह पाये हैं सो उस विषयमें एक प्रकृतिका प्रवेश करनेवाला जीव किस प्रकृतिका प्रवेशक होता है ऐसी आशंका करके 'सिया कोहसंजलणं वा' इत्यादि वचन कहा है। क्रोधके उदयसे श्रेणि पर चढ़े हुए जीवके वेदकी प्रथम स्थितिके उदयावलिके भीतर प्रवेश करने पर वहाँसे लेकर वह जीव एक क्रोध संज्वलनको ही उदीरणामें प्रवेश फासा है। उसी जोवके द्वारा क्रोधकी प्रथम स्थितिके उदयापलिमें प्रवेशित करने पर यहाँसे लेकर वह जीव मानसंज्वलनको उदीरणारूपसे प्रवेश कराता है। उसी जीवके मानकी प्रथम स्थितिके उदयावलिमें प्रवेश करने पर वहांसे लेकर मायासंज्वलनको उदीरणारूपसे प्रवेश कराता है। इसके बाद मायासंचलनकी प्रथम स्थितिके उदयावलिमें प्रविष्ट होने पर उससे श्रागे एकमात्र लोभका प्रवेशक होता है। अथवा अपने अपने उदयसे चढ़े हुए जीवके वेदकी प्रथम स्थितिके उदयापलिमें प्रविष्ट होने पर क्रोधसंज्वलन श्रादिका प्रवेशक होता है ऐसा कहना चाहिए। यहां पर सर्वत्र 'सिया' शब्दका फल एकान्तरूप अवधारणका निषेध करना है और 'वा' शब्द 'क' रूप विकल्पका वाचक है ऐसा ग्रहण करना चाहिए। इसप्रकार ये चार भंग एक प्रकृति के प्रवेशकके होते हैं इसप्रकार इस अर्थक सूचक उपसंहार वाक्यको कहते हैं * इसपकार चार भंग होते हैं। ६८२. यह सूत्र सुगम है। * दो प्रकृतियोंके प्रवेशकके बारह भंग होते हैं । ६८३. क्योंकि तीन वेदोंका एक एक संज्वलनके साथ अक्षपरावर्तन होकर उतने भंग निर्वाधरूपसे उपलब्ध होते हैं। यथा-कदाचिन् पुरुषवेद और क्रोधसंज्वलनको प्रवेशित करता
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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