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________________ } मार्गदर्शक :- आचार्य श्री सुविधिसागर जी महाराज उत्तरपयडिद्विदिउदीरणाए भुजगौरमणिय गरें ३४७ गा० ६२ ] ३७५७ आदेसेण येरइय० सोलसक० - दोक० भुज० - श्रवत्त० जह० एगस०, उक० अंतोनु० । सेसं णत्थि अंतरं । एवं मिच्छ० । णवरि अवत्त० श्रघं । एवं स० । वरि अवत्त० णस्थि । सम्म० सम्मामि० श्रघं । एवं सव्वणेरइय० । मिच्छ० सम्म० सम्मामि० - सोलसक०३७५८ पंचिदिपतिरिव खतिय० ऋणोक सारयभंगो | तिरिपवेद० भुज० जह० एगस०, उक्क० अंतोमु० | झवत्त० श्रधं । एवं पदाणं पस्थि अंतरं । णवरि पज० इत्थवेदो णत्थि । जोगिणीसु पुरिसके० एस० रात्थि । इत्थवे अवत० णत्थि । पंचिदियतिरिक्ख अपज० मिच्छ० - सोलसक० सत्तणोक० णारयभंगो। रावरि मिच्छ० अवत० णत्थि । मणुस दिए पंचि०तिरिक्खतियभंगो | एवर मणुसिणी० इत्थिबे० अवत्त० जह० एस० उ० बासपृधत्तं । मणुस अपज० सचत्रपग० सव्यपदा० जह० एयस०, उक्क० पलिदो ० श्रसंखे० भागो । O מ - काल साधिक चौबीस दिन-रात कहा है। सम्यक्त्वकी श्रवक्तव्य स्थितिके उदीरकोंका उत्कृष्ट अन्तरकाल सात दिन-रात उपशमसम्यक्त्वके उत्कृष्ट अन्तरकालको ध्यान में रखकर कहा है । शेष कथन सुगम हैं। आगे गतिमार्गणा के उत्तर भेदों में यह अन्तरकाल इस अन्तरकालको ध्यान में रखकर यथायोग्य जान लेना चाहिए। १७५७. आदेश नारकियों में सोलह कषाय और छह नोकषायकी भुजगार और वक्तव्य स्थिति के उद्दीरकोंका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त हैं । शेष पदोंके उदीरका अन्तरकाल नहीं हैं । इसीप्रकार मिध्यात्वकी अपेक्षा जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि इसकी अवक्तव्य स्थिति के उदीरकों का अन्तरकाल ओघके समान है । इसीप्रकार नपुंसकवेदकी अपेक्षा जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि यहाँ इसका अवक्तव्य पद नहीं है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिध्यात्वका भंग श्रोधके समान है। इसीप्रकार सज नारकियों में जानना चाहिए । ७८. पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चत्रिक में मिथ्यात्व सम्यक्त्व, सम्यग्प्रिध्यात्व, सोलह कपाय और छह नोकषायका भंग नारकियोंके समान है। तीन वेदोंकी भुजगार स्थितिके उदीरकों का जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । अवक्तव्य पदका भंग श्रोष 1 समान है । इसीप्रकार शेष पदोंके उद्दीरकोंका अन्तर नहीं है । इतनी विशेषता है कि तिर्यञ्च पर्याप्तकों में स्त्रीवेद नहीं हैं तथा योनिनियों में पुरुषवेद और नपुंसकवेद नहीं है। इनमें स्त्रीवेदकी अवक्तव्य स्थितिउदीरणा नहीं है । पश्चेन्द्रिय तिर्यख अपर्याप्तकों में मिध्यात्व, सोलह कषाय और सात नोकषायका भंग नारकियोंके समान है। इतनी विशेषता है कि इनमें मिथ्यात्वको अवक्तव्य स्थितिउदीरणा नहीं है। मनुष्यत्रिक में पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चत्रिक के समान भंग है । इतनी विशेषता है कि मनुष्यिनियों में स्त्रीवेदकी अवक्तव्य स्थितिके उदीरकों का जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व है। मनुष्य अपर्याप्तकों में सब प्रकृतियों के सब पदके उदरका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण है । •
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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