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________________ गा० ६२ ] उत्तरपट्टिवीरणाए सारणा जीवेहिं अंतरं ३०६ ७. अज० णत्थि अंतरं । सम्मामि० जह० डिदिउदी० जह० एयस०, उक्क० अंगुलस्स असंखे० भागो । अजह० जह० एक्स०, उक्क० पलिदो० श्रसंखे० भागो । चारसक०भय-दुर्गुहा० जह० अजह० णत्थि अंतरंगता संजलै रिस वेद डिदि उदाहराज ज० यस०, उक्क० वासं सादिरेयं । अजह० पस्थि अंतरं । इत्थिवेद - एस० जह० विदिउदी० जह० एयसमत्रो, उक्क० वासुपुधत्तं । अजह० णत्थि अंतरं । चदुणोक० जह० द्विदिउदी० जह० एगसमओ, उक्क० अंगुलस्स असंखे० भागो । अज० णत्थि अंतरं । अन्तरकाल छह महीना है। अजघन्य स्थितिके उदीरकोंका अन्तरकाल नहीं हैं । सम्यग्मिभावकी जघन्य स्थिति के उदीरकों का जघन्य अन्तरकाल एक समय हैं और उत्कृष्ट अन्तरकाल अंगुल असंख्यातवें भागप्रमाण है । अजघन्य स्थितिके उदीरकोंका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण है । बारह कषाय, भय और जुगुप्साकी जघन्य और अजघन्य स्थितिके उदीरकोंका अन्तरकाल नहीं है। तीन संज्वलन और पुरुषवेदी जघन्य स्थितिके उदीरकोंका जघन्य अन्तरकाल एक समय हैं और उत्कृष्ट अन्तरकाल साधिक एक वर्षप्रमाण है। अजघन्य स्थितिक उद्दीरकोंका अन्तरकाल नहीं है । स्त्रीवेद और नपुंसक वेद की जघन्य स्थिति के उदीरकोंका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल वर्षपृथक्त्वप्रमाण है। अजघन्य स्थिति के उदीरकों का अन्तरकाल नहीं है । चार की जघन्य स्थिति के उदीरकोंका जघन्य अन्तरकाल एक समय है, और उत्कृष्ट अन्तरकाल अंगुल के असंख्यात भागप्रमाण है। अजघन्य स्थितिके उदीरकों का अन्तरकाल नहीं है। विशेषार्थ - उपशमसम्यक्त्वकी प्राप्तिका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल सात दिन-रात है। इसलिए यहाँ मिथ्यात्वकी जघन्य स्थिति के उदीरकोंका जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल सात दिन-रात कहा है । सम्यक्त्वकी क्षपणा और क्षपकश्रेणिका जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल छह महीना है, इसलिए यहाँ सम्यक्त्व और लोभसंज्वलनकी जघन्य स्थिति के उदीरकोंका जघन्थ अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल छह महीना कहा हैं । ऐसे जीव जो सम्यग्मिथ्यात्व की जघन्य स्थितिकी उदीरणा करते हैं उनका अघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल अंगुलके असंख्यात भागप्रमारण बन जाता है, इसलिए यहाँ सम्यग्मिध्यात्व प्रकृतिकी अपेक्षा यह अन्तरकाल उक्त कालप्रमाण कहा है। बारह कषाय, भय और जुगुप्साकी जघन्य स्थितिकी उदीरणा करनेवाले जीव निरन्तर पाये जाते हैं, इसलिए इनकी अपेक्षा जघन्य स्थितिके उदीरकों के अन्तरकालका निषेध किया है। तीन संज्वलन और पुरुषवेदके उदीरक जीव क्षपकश्रेणिपर न चढ़ें तो अधिक से अधिक साधिक एक वर्षतक नहीं चढ़ते, इसलिए यहाँ इनकी जघन्य स्थिति उदोकोंका जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल साधिक एक वर्ष कहा है। स्त्रीवेदी और नपुंसकवेदी जीवों की अपेक्षा क्षपकभेगिका उत्कृष्ट अन्तरकाल agesप्रमाण है, इसलिए यहाँ स्त्रीवेद और नपुंसकवेदक जघन्य स्थिति के उदीरकों का जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल वर्षे प्रथक्त्व कहा है। चार नोकषायोंकी जवन्य स्थितिके उदीरकोंके जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकालका स्पष्टीकरण सम्यग्मिध्यात्वकी
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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