SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 321
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ३०६मार्गदर्शक :- आचार्य श्री सुविधासहि कसायवाडे १६८५. अंतरं दुविहं -- जह० उक्क० । उक्कस्से पथदं । दुविहो णि० श्रोषेण श्रादेसेण य | ओघेण सब्वपय० उक्क० हिदिउदी० जह० एयस०, उक्क० अंगुलस्स असंखे० भागो । अणुक० णत्थि अंतरं । वरि सम्मामि० अणुक० जह० एम०, उक० पलिदो० असंखे ० भागो । आदेसेण सव्वरइय० सव्यतिरिक्ख - सच्च मणुस्स सच्चदेवा सि जाओ पयडीओ उदीरिति तासिमोघं । णवरि मणुस० अपज० सच्चामिमणुक ० जह० एयस०, उक्क० पलिदो० असंखे० भागो । एवं जाब ० | ६८६. जहणए पदं । दुविहो णि० - श्रोषेण आदेसेण य | ओघेण मिच्छ० ० जह० डिदिउदी० जह० एयस०, उक्क० सत्त रार्दिदियाणि । अजह० णत्थि अंतरं । सम्म० लोभसंजल० जह० डिदिउदी० जह० एयस०, उक० छम्मासं । जानना चाहिए | ६ ६८५. अन्तर दो प्रकारका है- जघन्य और उत्कृष्ट । उत्कृष्टका प्रकरणा है। निर्देश दो प्रकारका है - ओघ और आदेश । श्रोघसे सब प्रकृतियोंकी उत्कृष्ट स्थितिके उदीरकोंका जघन्य अन्तर काल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर काल अंगुलके असंख्यातवें भागप्रमाण है । अनुत्कृष्ट स्थिति उदीरकोंका अन्तरकाल नहीं है । इतनी विशेषता है किं सम्यग्मिथ्यात्व की अनुत्कृष्ट स्थिति के उदीरकों का जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल पल्य के असंख्यात भागप्रमाण है । आदेश से सब नारकी, सब तिर्थन, सब मनुष्य और सब देत्रों में जिन प्रकृतियोंकी उदीरणा होती है उनका भंग श्रोध के समान है। इतनी विशेषता है कि मनुष्य पर्यातकों में सब प्रकृतियांकी अनुत्कृष्ट स्थितिके उदीरकोंका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण है। इसीप्रकार अनाहारक मार्गात जानना चाहिए। वेदगी [ ७ विशेषार्थ - नाना जीव यदि सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृतिके सिवा शेष सत्र प्रकृतियों की उत्कृष्ट स्थितिउदीरणा न करें तो कमसे कम एक समयतक और अधिक से अधिक अंगुल के असंख्यातवें भागप्रमारण कालतक नहीं करते । यही कारण है कि यहाँ प्रोघसे उक्त सब प्रकृतियों की उत्कृष्ट स्थितिके उदीरकों का जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल गुल के असंख्यात भागप्रमाण कहा है। मात्र सम्यग्मिध्यात्व गुणस्थानका जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल पल्यके श्रसंख्यातवें भागप्रमाण है। इसलिए सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृतिकी अपेक्षा उक्त प्रकारसे अन्तरकालका निर्देश अलग से किया है। चारों गतियों में यह अन्तरकाल बन जाता है, इसलिए उसे ओघ के समान जानने की सूचना की है। मात्र मनुष्य अपर्याप्त यह सम्यग्विध्यात्व गुणस्थानके समान सान्दर मार्गणा है, इसलिए इस बातको ध्यान में रखकर इनमें सब प्रकृतियोंकी अनुत्कृष्ट स्थितिके उदीरकोंका जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण कहा है। १६८६. जघन्यका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है - प्रोध और आदेश । भोधसे मिध्यात्वकी जघन्य स्थितिके उदीरकों का जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर काल सात रात्रि-दिवस है । अजघन्य स्थितिके उदीरकों का अन्तरकाल नहीं है । सम्यक्त्व और लोभसंज्वलनकी जघन्य स्थितिके उदीरकों का जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy