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________________ गा० ६२] उत्तरपयडिउदीरणाप ठाणाणं सेमाणियोगदारपरूवरणा ४३५. बिदियादि छट्टि त्ति मोह, जह द्विदिउदी. जहण्णुक्क० एयस० । अज० जहष्णुक्कस्सहिदी । एवं जोदिसियादि जात्र सन्नट्ठा ति । सत्तमाए मोह. जह डिदिउदी० जह• एयस०, उक्क० अंतोमु० । अज० जह. अंतोमु०, उक्क० तेतीसं सागरो। ४३६. तिरिक्वेसु मोह० जहटिदिउदी० जह० एयस०, उक्क० अंतोमु० । अज० जह० एयस०, उक्क० असंखेला लोगा। पंचिंदियतिरिक्खतिए मोह. जह. ट्ठिदिउदी० जहण्णुक० एयस० । अजह. जह० श्रावलिया समयूणा, उक. विशेषार्थ-- नारकियोंमें मोहनीयकी जघन्य स्थिति उदीरणाका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय जैसे पूर्वमें घटित करके बतला पाये हैं उसी प्रकार यहाँ और आगे घटिप्त कर लेना चाहिए । विशेषता न होनेसे उसका अलगसे खुलासा नहीं करेंगे। नरकमें अपने स्वामित्वके अनुसार जघन्य स्थिति उदीरणा यहाँ उत्पन्न होनेके बाद एक प्रावली भौर एक समय जानेपर द्वितीय समयमें ही प्राप्त होती है। इससे पूर्व अजघन्य स्थितिउदीरणा होती रहती है, इसलिए इनमें अजघन्य स्थितिउदीरणाका जघन्य काल एक समय अधिक एक आवलि कहा है। शेष कथन सुगम है। मार्गदर्शक :- आचार्य श्री सुविहिासागर जी महाराज ४३५. दूसरी पृथिवीसे लेकर छठी पृथिवी तकके नारकियों में मोहनीयकी जघन्य स्थितिउदीरणाका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है। अजघन्य स्थितिउदीरणाका जघन्य काल जघन्य स्थितिप्रमाण और उत्कृष्ट काल उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण है,। इसीप्रकार ज्योतिषियोंसे लेकर सर्वार्थसिद्धि त कके देवाम जानना चाहिए । सातत्री पृथिवीम मोहनीयकी जघन्य स्थिति'उदीरणाका जयन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहर्त है। अजघन्य स्थितिउदीरणाका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल तेतीस सागर है। विशेषार्थ----दूसरे नरकसे लेकर छठे नरक तक जघन्य स्थिति उदीरणा अपने-अपने स्वामित्वके अनुसार भवके अन्तिम समय में प्राप्त होती है। अतः इनमें जघन्य स्थिति उदारणा. का जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय कहा है। तथा जो उक्त नारक। उक्त प्रकारसे जघन्य स्थिति उदीरणा नहीं करते उनके सर्वदा अजघन्य स्थितिकदीररणा बन जानसे इस अपेक्षा अजयन्य स्थितिउदीरणाका जघन्य काल जघन्य स्थितिप्रमाण और उत्कृष्ट काल उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण कहा है। ज्योतिषी देवोंसे लेकर सार्थसिद्धि तक देवों में यह काल अपने स्वामित्वके अनुसार उक्त पद्धतिसे बन जाता है, अतः इनमें द्वितीयादि नरकोंके समान कालके जानने की सूचना की है। सातवें नरकमें अपने स्वामित्वके अनुसार जघन्य स्थितिउदीरमाका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल अन्तमुहर्त बन जाता है, इसलिए इनमें यह काल उक प्रमाण कहा है। तथा इनमे अजघन्य स्थिति नदीरणाका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त जघन्य स्थितिउदीरणाके बाद प्राप्त होनेवाला लिया है। उत्कृष्ट काल उत्कृष्ट भवस्थितिप्रमाण दाता है यह स्पष्ट ही है। ६४३६. निर्योंमें मोहनीयको जघन्य स्थिति जीणाका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है। अजघन्य स्थिनिध्दीराका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल असंख्यात लोकपमाग है। पञ्चेन्द्रिय निर्थञ्चत्रिक माहनीयको जघन्य स्थितिउदीरणाका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है। अजघन्य स्थिति उदीरणाका जघन्य काल
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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