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________________ गा० ६२] उत्तरपयडिउदीरणाए ठाणाणं सेसारिणयोगदारपरूवणा अंतोमु० ! अणुक्क० जह• अंतोमु०, उक० अणंतकालमसंखेजा पोग्गलपरियट्टा । एवं तिरिक्खाणं । णवरि अणुक्क० जह• एयस० । ४३१. आदेसेण गरइय. उक० द्विदिउदीर. जह० एयसमओ, उक्क० अंतोमु० । अणुक्क. जह० एयम०, उक्क० तेत्तीसं सागरोबमाणि 1 एवं सचणेरइय० पंचिंदियतिरिक्खतिय ३ मणुसतिय-देवा भवणादि जाव सहस्सार त्ति । णवरि सगदिदी । मार्गदर्शक :- आई सी पाचदियातरिक्व अवजल-माणुसअपज्ज० मोह, उक्क हिदि उदीरणा जह० उक्क० एयस० । अणुक० जह. खुद्दाभवग्गहरणं समऊणं, उक्क० अंतोमु० । जवन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहर्त है । अनुत्कृष्ट स्थितिउदीरणाका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अनन्त काल है जो असंख्यान पुगल परिवर्तनप्रमाण है। इसी प्रकार तिर्यकचा में है। इतनी विशेषता है कि इनमें अनुत्कृष्ट स्थिति उदारणाका जघन्य काल एक समय है। विशेपार्थ-मोहनीयकी उत्कृष्ट स्थितिका जघन्य बन्धकाल एक समय और उत्कृष्ट बन्धकाल अन्तर्मुहूर्त होनेस उसकी उदीरणाका यह काल बन जानेसे उत्कृष्ट स्थितिउदीरणाका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त कहा है। उत्कृष्ट स्थितिबन्धके बाद पुनः उसका बन्ध कमसे कम अन्तर्मुहूत के पहले नहीं होता और ऐसा जीव यदि एकेन्द्रियों में मरकर उत्पन्न हो जाता है और सबसे अधिक काल तक यहाँ तथा यथायोग्य असंनियों में रहकर पुनः संज्ञी पर्याप्त होता है तो अधिकसे अधिक अनन्त काल बाद ही वहाँ उत्पन्न होता है । यही कारण है कि ओघसे मोइनीयकी अनुत्कृष्ट स्थितिउदीरणाका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अनन्त काल कहा है । तिर्यञ्चोंमें यह श्रीधप्ररूपणा बन जाती है, इसलिए उनमें ओषके समान जाननेकी सूचना की है। मात्र तिर्यकचोंमें ऐसा जीव भी श्राकर उत्पन्न हो सकता है जो अनुत्कृष्ट स्थितिउनीरणा एक समय तक करके उत्कृष्ट स्थितिजदीरणा करने लगे। यह। कारण है कि इनमें अनुत्कृष्ट स्थिति उदीरणाका जघन्य काल एक समय कहा है। ५३१. श्रादेशसे नारकियोंमें उत्कृष्ट स्थितिउदारणाका जवन्य काल एक समय है, और उत्कृष्ट काल अन्तमुहूर्त है। अनुत्कृष्ट स्थितिउदीरयाका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल तेतीस सागर है। इसीप्रकार सब नारकी, पन्देन्द्रिय तिर्यचत्रिक, मनुष्यत्रिक, सामान्य देव और भवनवासियोंसे लेकर सहस्रार कल्प सकके देवों में जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि अपनी-अपनी स्थिति कहनी चाहिए। विशेषार्थ—पूर्वमें जिस प्रकार सामान्य तियंचामें स्पष्टीकरण किया है उस प्रकार यहाँ कर लेना चाहिए । यहाँ सर्वत्र जो अनुत्कृष्ट स्थितिउदीरणाका उत्कृष्ट काल अपनी अपनी स्थितिप्रमाण कहा है यो उस उस गतिमें यथायोग्य सम्यक्त्व और मिथ्यात्त्र परिणाम के साथ इसप्रकार रखे जिससे उस उस गतिमें उत्कृष्ट स्थितिबन्ध तथा तदनुसार उत्कृष्ट स्थिति उदारणा न प्राप्त हो। ६४३२. पन्चेन्द्रिय तिर्यच अपर्याप्त और मनुष्य अपर्याप्रकोंमें मोहनीयकी उत्कृष्ट स्थिनि उदीरणाका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है । अनुत्कृष्ट स्थिति उदारणाका जघन्य काल एक समय कम क्षुल्लकभवग्रहणप्रमाण और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है। आनत कल्पस
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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