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________________ " गा० ६२ ] उत्तरपडिउदीरणाए ठाणाएं से साथियोगदार परूवणा १५५ २२ जह० एस० उ० आवलि० असंखे० भागो । २१ जह० अंतोमु०, उक्क० पलिदो० असंखे० भागो । एवं जोगिणी० - भवण० वाण० जोदिसियाणं । पंचि०तिरिक्त अप० सच्चपदा सन्वद्धा । मणुसतिए योघं । णवरि २५ जह० एयसमओ, उक० तोमु० । मणुस अपज • २८ २७२६ ज६० एयस०, उक० पलिदो ० संभागो । अणुद्दिसादि सम्बट्टा त्ति २८ २४ २१ सन्नद्धा | २२ जद्द० एगम, उक्क० अंतोमु० । एवं जाय । मार्गदर्शक आचार्य श्री सुविधियागर जी महाराज.. जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल श्रावलिके असंख्यातवें भागप्रमाण है । २१ प्रकृतिथोंके प्रवेशकोंकः जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल पल्य के असंख्यात भागप्रमाण हैं | दसी प्रकार योनिनी तिर्यञ्च भवनवास, व्यन्तर और ज्योतिषी देवोंमें जानना चाहिए | पश्चान्द्रय तिर्यन अपर्याप्तकों में सम पदोंके प्रवेशकों का काल सर्वदा है। मनुष्यत्रिक में श्रोत्रके समान भंग है । किन्तु इतनी विशेषता है कि इनमें २४ प्रकृतियोंके प्रवेशकोंका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है। मनुष्य अपर्याप्त २८, २७, और २६ प्रकृतियों के प्रवेशकोंका जघन्य काल एक समय हैं और उत्कृष्ट काल पल्य के असंख्यातयें भागप्रमाण है। अनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धितक के देवामें २८, २४ और २१ प्रकृतियोंके प्रदेशकों का काल सर्वदा है । २२ प्रकृतियोंके प्रवेशकोंका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है। इसी प्रकार अनाहारक मार्गणा तक जानना चाहिए । विशेषार्थ – अनानुबन्धीका बियोजक जो उपशमसम्यग्दृष्टि जीव सासादन में जाता है वह प्रथम समय में २२ प्रकृतियोंका प्रवेशक होता है और यदि वह द्वितीयादि समय में सासादनमें रहता है तो २५ प्रकृतियोंका प्रवेशक हो जाता है। तथा जो उपशमसम्यग्दृष्टि अनन्तानुबन्धीकी विसंयोजना किये बिना सासादन में जाता है वह जितने काल तक सासादनमें रहता है उसने काल तक पच्चास प्रकृतियोंका ही प्रवेशक होता है। एक समय तक रहता है तो उतने काल तक २५ प्रकृतियोंका प्रवेशक होता है और छह आवलिकाल तक रहता है तो उत्तने काल तक पच्चीस प्रकृतियों का प्रवेशक होता है । अब यदि त्रुटित सन्तानकी अपेक्षा इस कालका विचार करते हैं तो वह कमसे कम एक समय प्राप्त होता है और अत्रुटित सन्तानकी अपेक्षा इसका विचार करते हैं तो वह पल्य के असंख्यातवें भागप्रमाण प्राप्त होता है । यही कारण है कि यहाँ पर नारकियों में इस पद के प्रवेशकों का जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल पल्य के असंख्यातवें भागप्रमाण कहा है। २२ प्रकृतियों के प्रवेशकों का जघन्य काल एक समय है यह तो हमने पूर्व में बतलाया ही है। किन्तु इस पदके प्रवेशकोंका उत्कृष्ट काल उन जीवोंके होता है जो सम्यक्त्वकी क्षपणा कर रहे हैं। अन्यथा यह काल श्रावस्तिके असंख्यातवें भागप्रमाण ही प्राप्त होता है। यही कारण है कि सामान्य नारकियों में और प्रथम पृथिवीके नारकियों में २२ प्रनियोंके प्रवेशकों का जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त कहा है। तथा द्वितीयादि पृथिवियां नारकियों में इस पद के प्रवेशकोंका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आलिके असंख्यातवें भागप्रमाण कहा है। तिर्यद्धद्विक और सौधर्म कल्पसे लेकर नौ मैवेयक तके देव तो सामान्य नारकियोंके समान ही काल बन जाता है, क्योंकि इनमें कृतकृत्यचेदक सम्यग्दृष्टि जीवोंकी उत्पत्ति सम्भव हैं । किन्तु योनिनी तिर्यञ्च और भवनन्त्रिक में दूसरी पृथिवीके मानं काल बनता है, क्योंकि इनमें कृतकृत्यवेदक सम्यग्टष्टियों की उत्पत्ति नहीं होती । उक्त सब मार्गणाओं में कालका शेष कथन समान है। मनुष्य त्रिक में संख्यास जीव ही पच्चीस प्रकृतियों के प्रवेशक होते हैं। इसलिए इनमें इस पदके प्रवेशकों का जघन्य काल एक
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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